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छत्तीसगढ़ में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम फेल? अपराधियों का प्रभावी दंड सुनिश्चित करने में असफल ?कानून से परे हटकर नई गैरकानूनी व्यवस्था बनाने वाले ऐसे अधिकारी क्या प्रदेश को चाहिए? : सिंघवी

On: February 4, 2026 10:04 AM

छत्तीसगढ़ में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम फेल? अब अपराधियों का सामाजिक बहिष्कार करवायेगा वन विभाग। रायपुर (वायरलेस न्यूज 04.02.2026) / राज्य में लगातार बढती अवैध शिकार की घटनाओं, बड़े पैमाने पर अवैध शिकार की घटनाओं के बावजूद विभाग द्वारा अब तक अधिकांश मामलों में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत प्रभावी दंड सुनिश्चित करने में असफल रहने और कमजोर विवेचना, अपूर्ण साक्ष्य संकलन एवं दोषपूर्ण केस तैयारी, जिसके कारण अभियुक्तों को गिरफ्तारी के अगले ही दिन जमानत मिल जाती है, जैसी विभागीय विफलताओं और बढ़ती आलोचना के मद्दे नजर वन विभाग ने अब नया अवैधानिक एवं असंवैधानिक मार्ग अपनाया है जिसके तहत अब वन विभाग अपराधियों का सामाजिक स्तर पर बहिष्कार करवायेगा जिसके निर्देश मीटिंग में जारी भी कर दिए गए है।मुखिया, धर्मगुरु, प्रतिष्ठित व्यक्ति एवं समाजसेवी संस्थाओं से लेंगे सहायता दिनांक 24.12.2025 को आयोजित मासिक समीक्षा बैठक, जिसमे 15 आईएफएस और 4 राज्य वन सेवा अधिकारी सम्मलित हुए थे, में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) की अध्यक्षता में अधीनस्थ अधिकारियों को यह निर्देश दिए गए कि ‘‘वन एवं संरक्षित क्षेत्रों के भीतर फंदा लगाकर बड़ी संख्या में अवैध शिकार की घटनाएँ सामने आती हैं तथा बड़ी संख्या में अपराधी पकड़े भी गए हैं। ऐसे अपराधियों को सामाजिक स्तर पर बहिष्कृत करने के उद्देश्य से संबंधित गाँव के मुखिया, धर्मगुरु, प्रतिष्ठित व्यक्ति एवं समाजसेवी संस्थाओं के साथ बैठक आयोजित की जाए। उनके गाँवों में कैंप लगाकर घटित अवैध शिकार की फोटोग्राफ्स प्रदर्शित की जाएँ तथा वन्यजीव अपराध की रोकथाम के नाम पर अपराधियों को दंडित अथवा बहिष्कृत करने की अपील की जाए। इस प्रकार की बैठक पहले कवर्धा वनमंडल एवं उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व अंतर्गत आयोजित किए जाने हेतु योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए। साथ ही समस्त वनाधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में अपराधियों/संदिग्धों की सूची संधारित करने के भी निर्देश दिए गए।क्या होता है सामाजिक बहिष्कार
सामाजिक स्तर पर बहिष्कृत करने का तात्पर्य किसी व्यक्ति या परिवार को समाज से अलग-थलग कर देना है, जिसके परिणामस्वरूप उसे सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन से जानबूझकर वंचित किया जाता है। इसके अंतर्गत सामुदायिक संबंधों का विच्छेद, सार्वजनिक अपमान, सामाजिक सहभागिता से रोक, लेन-देन एवं सहयोग समाप्त करना तथा भय अथवा दबाव के माध्यम से दंडात्मक स्थिति उत्पन्न करना शामिल है। प्रदेश के ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में इस प्रकार सामाजिक स्तर पर बहिष्करण व्यक्ति की आजीविका, मान-सम्मान एवं सुरक्षित जीवन पर प्रत्यक्ष आघात करता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में व्यक्ति आत्महत्या जैसे अत्यंत गंभीर कदम उठाने को भी विवश हो सकता है।मुख्य मंत्री और मुख्य सचिव को पत्र लिखा वन विभाग के इस निर्देश को लेकर रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने मुख्य मंत्री और मुख्य सचिव को पत्र लिख कर बताया है कि प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) द्वारा अपनाई गई यह कार्यप्रणाली संविधान के अनुच्छेद 14, 19 एवं 21 के अंतर्गत प्रदत्त समानता, स्वतंत्रता एवं गरिमापूर्ण जीवन के अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित रूल ऑफ़ लॉ के सिद्धांत के प्रतिकूल एक अवैधानिक, असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी सामाजिक दंड के समान है, जिसे लागू करने का अधिकार किसी भी प्रशासनिक अधिकारी, ग्राम समाज अथवा गैर-न्यायिक संस्था को प्राप्त नहीं है। किसी भी अपराध के लिए दंड निर्धारण का अधिकार केवल न्यायालय को है। ग्राम समाज, धर्मगुरुओं अथवा सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से सार्वजनिक अपमान, भय अथवा सामाजिक दबाव का वातावरण बनाना पूर्णतः असंवैधानिक, अनैतिक एवं शासन की घोषित नीतियों के प्रतिकूल है।छत्तीसगढ़ शासन स्वयं सामाजिक बहिष्करण जैसी कुप्रथाओं का विरोध करता रहा है। ऐसे में शासन के एक अत्यंत वरिष्ठ अधिकारी द्वारा इस प्रकार की असामाजिक एवं अवैधानिक कार्यप्रणाली को न केवल प्रोत्साहित किया जाना, बल्कि उसे विभागीय निर्देशों के रूप में लागू कराने का प्रयास किया जाना अत्यंत चिंताजनक है। इससे समाज में वैमनस्य, भय एवं विभाजन की स्थिति उत्पन्न होगी तथा सामाजिक सौहार्द को गंभीर क्षति पहुँचेगी। यह न केवल शासन की नीति एवं संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला आचरण है।
सिंघवी ने पत्र में लिखा है कि हमें कई बार सोचना चाहिए कि कानून से परे हटकर नई गैरकानूनी व्यवस्था बनाने वाले ऐसे अधिकारी क्या प्रदेश को चाहिए? यह विषय केवल वन्यजीव संरक्षण तक सीमित न होकर राज्य में सामाजिक सौहार्द, संवैधानिक मर्यादा एवं शासन की विश्वसनीयता से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। इसलिए कानून का पालन न करने वाले/को न मानने वाले अधिकारियों को पद से हटा देना चाहिए ताकि भविष्य में प्रदेश का सामाजिक सौहार्द प्रभावित न हो एवं शासन की छवि को क्षति न पहुँचे।तब क्या होगा जब अपराधी कोर्ट से दोष मुक्त हो जाए?सिंघवी ने वन विभाग के अधिकारियों से पूछा कि अगर कोई अपराधी कोर्ट से दोष मुक्त हो जाए और उसे पहले ही सामाजिक बहिष्कार की सजा वन विभाग ने दिलवा दी है हो उसे मिली मानसिक प्रताड़ना की भरपाई कौन करेगा?
नितिन सिंघवी
9826126200

Author Profile

Amit Mishra
Amit Mishra
अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

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