छत्तीसगढ़ की वैश्विक अस्मिता की नायिका : तीजन बाई
(श्रद्धांजलि)
(वायरलेस न्यूज छत्तीसगढ़ परिवार अपनी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है)
आज छत्तीसगढ़ ने अपनी वह स्वर-साधिका खो दी, जिसने अपनी बुलंद आवाज़, अद्भुत अभिनय और अप्रतिम लोक-प्रतिभा से न केवल पंडवानी को नया जीवन दिया, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को विश्व मंच पर स्थापित किया। पद्म विभूषण से सम्मानित लोकगायिका डॉ. तीजन बाई का निधन केवल एक कलाकार का अवसान नहीं है, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति के एक उज्ज्वल अध्याय का विराम है।
तीजन बाई का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि प्रतिभा किसी सुविधा की मोहताज नहीं होती। दुर्ग जिले के गनियारी ग्राम में जन्मी इस असाधारण लोक कलाकार ने अत्यंत साधारण परिस्थितियों से अपनी यात्रा आरम्भ की। बचपन में अपने नाना से महाभारत की कथाएँ सुनते-सुनते उनके भीतर पंडवानी का बीज अंकुरित हुआ। उन्होंने कठिन संघर्षों के बीच अपनी साधना जारी रखी और समाज की रूढ़ियों को चुनौती देते हुए पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देने वाली पहली महिला कलाकार बनीं। यह केवल कला का परिवर्तन नहीं था, बल्कि स्त्री अस्मिता और आत्मविश्वास की भी ऐतिहासिक घोषणा थी।
तीजन बाई ने महाभारत को केवल गाया नहीं, बल्कि उसे मंच पर जीवंत कर दिया। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का रथ और कभी द्रौपदी की वेदना। उनकी वाणी में लोक का दर्द था, अभिनय में महाकाव्य का वैभव और प्रस्तुति में भारतीय संस्कृति की विराटता। दर्शक केवल श्रोता नहीं रहते थे; वे स्वयं महाभारत के पात्रों के साथ चलने लगते थे।
लोक रंगकर्मी हबीब तनवीर की दृष्टि जब तीजन बाई पर पड़ी, तब उनकी कला को राष्ट्रीय पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने देश ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक गरिमा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने सिद्ध किया कि लोककला किसी क्षेत्र की सीमा में बंधी नहीं होती; उसकी संवेदना सार्वभौमिक होती है।
उनकी कला-साधना को भारत सरकार ने पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण और अंततः पद्म विभूषण से सम्मानित किया। अनेक विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियाँ प्रदान कीं। परंतु इन सम्मानों से कहीं अधिक बड़ा सम्मान वह प्रेम था, जो उन्हें करोड़ों श्रोताओं और दर्शकों से मिला।
तीजन बाई छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता की जीवित प्रतीक थीं। उन्होंने यह स्थापित किया कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, संस्कृति और आत्मा की वाहक होती है। उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी लोकपरंपराओं पर गर्व करना सिखाया और यह विश्वास जगाया कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी विश्व पटल पर सम्मान प्राप्त किया जा सकता है।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब उनका स्वर, उनकी शैली और उनकी सांस्कृतिक चेतना सदैव जीवित रहेगी। आने वाली पीढ़ियाँ जब भी पंडवानी का नाम लेंगी, तीजन बाई का स्मरण श्रद्धा और गर्व के साथ करेंगी। वे केवल एक कलाकार नहीं थीं; वे छत्तीसगढ़ की आत्मा की आवाज़ थीं।
छत्तीसगढ़ की धरती अपनी इस महान लोकनायिका को शत-शत नमन करती है। भारतीय लोकसंस्कृति सदैव उनकी ऋणी रहेगी। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करे तथा उनके परिजनों, शिष्यों और असंख्य प्रशंसकों को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे।
विनम्र श्रद्धांजलि!
“स्वर भले मौन हो गया हो, पर संस्कृति का वह आलोक कभी नहीं बुझेगा।
तीजन बाई का नाम भारतीय लोकपरंपरा के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।”
*डॉ सुधीर शर्मा,
अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़*
Author Profile
Latest entries
Uncategorized2026.07.05छत्तीसगढ़ की वैश्विक अस्मिता की नायिका : तीजन बाई (श्रद्धांजलि)
Uncategorized2026.07.05राज्यपाल श्री रमेन डेका ने पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया*
Uncategorized2026.07.05हाईटेक बस स्टैंड में निगम की बड़ी कार्रवाई,2022 से किराया नहीं चुकाने वाले 19 बस संचालकों के कार्यालयों पर जड़े ताले*
Uncategorized2026.07.04बड़ी राहत : आवाजाही के लिए खुला तान नदी ब्रिज,रिकॉर्ड समय में पूरा किया गया मरम्मत कार्य*


