*नुआखाई: भारतीय संस्कृति की अमर धरोहर और कृषि परंपरा का महान उत्सव*

लेखक: अधिवक्ता भगवानू नायक (सामाजिक कार्यकर्ता)

(वायरलेस न्यूज) भारत की सांस्कृतिक विरासत में कृषि पर्वों का विशेष स्थान है और *नुआखाई* उनमें से एक ऐसा उत्सव है जो न केवल ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सीमाओं तक सीमित है, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय कृषि संस्कृति का प्रतीक है। इस वर्ष 28 अगस्त 2025 को मनाया जाने वाला यह पर्व छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा *स्थानीय अवकाश** घोषित किए जाने से और भी महत्वपूर्ण हो गया है, जिससे राज्य के उड़िया समाज और जनजातीय समुदाय में अत्यधिक उत्साह है ।

*नुआखाई : प्रकृति और संस्कृति का अद्वितीय संगम*

नुआखाई शब्द दो शब्दों *”नुआ” (नया)* और *”खाई” (खाना)* से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है *”नए अन्न का स्वागत”*। यह पर्व भाद्रपद माह की शुक्ल पंचमी (ऋषि पंचमी) को मनाया जाता है, जो गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद आता है । इस दिन नया धान और नवान्न सबसे पहले अपने अपने ईष्ट देवी-देवताओं को अर्पित करते हैं और फिर परिवार के साथ उसका भोग लगाते हैं ।

*छत्तीसगढ़ में नुआखाई का महत्व*

भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा छत्तीसगढ़, जिसे *”धान का कटोरा”* कहा जाता है । भारतीय संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक में राज्य नीति निदेशक तत्व में एक आदर्श राज्य की स्थापना के लिए दिशा निर्देश उल्लेखित है जिसके अनुच्छेद 48 में कृषि और पशुपालन संगठन की परिभाषा दी गयी है। नुआखाई जैसे पर्व को बढ़ावा देना संविधान की भावना के अनुरूप है। लाखों की आबादी वाला उड़िया समाज का एक बड़ा भाग भले ही आज मेहनत, मज़दूरी और संघर्ष कर अपना जीवन यापन करता है पर अपने पूर्वजों के द्वारा दी गयी भारतीय संस्कृति की धरोहर नुआखाई पर्व को वह धूमधाम से मनाते है है। नुआखाई विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के रायपुर, दुर्ग, राजनंदगाँव, बिलासपुर, गरियाबंद, महासमुन्द, रायगढ़, जशपुर, गौरेला-पेंड्रा, धमतरी और बस्तर के क्षेत्रों में उत्साह से मनाया जाता है । यहाँ इसे *नुआखाई *”नवाखाई”* और *नवापानी* आदि नाम से भी जाना जाता है, । छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा इस पर्व को *स्थानीय अवकाश* दिए जाने से स्थानीय समुदायों को अपनी परंपराओं को पूर्ण उत्साह के साथ मनाने का अवसर मिला है ।

*सामाजिक एकता और आध्यात्मिक महत्व*

नुआखाई केवल एक कृषि उत्सव नहीं बल्कि सामाजिक एकता, भाईचारे और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है। इस दिन: –

1. कुरे पत्ता में नया धान का चूड़ा , दूध, गुड़, घी के मिश्रण से बना प्रसाद अर्पण और ग्रहण करने के पाश्चात विभिन्न प्रकार के पारम्परिक व्यंजन अड़सा, भाजा पीठा, मूँग साग, दाल भात आदि तैयार कर परिवार और समुदाय एक साथ भोजन करते हैं जिसे *”नुआखाई भोग”* कहा जाता है ।

2. प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात, धोती कुर्ता, नव वस्त्र धारण बड़ों का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है और पुराने मतभेदों को भुलाकर नए रिश्ते बनाए जाते हैं ।

3. घर प्रमुख सदस्य पुरुष-महिलाएँ नुआखाई पर्व के एक दिन पूर्व का उपवास रखकर देवी देवताओं को आह्वान करते है और पूजा अर्चना करते हैं।

*ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि*

नुआखाई की परंपरा वैदिक काल से जुड़ी हुई है, जहाँ इसे प्रलम्बन यज्ञ (नई फसल की कटाई का अनुष्ठान) के रूप में मनाया जाता था । इतिहासकारों के अनुसार, 12वीं शताब्दी में पश्चिमी ओडिशा के राजा रमईदेव ने इस पर्व को कृषि को बढ़ावा देने के लिए प्रारंभ किया था । आज यह पर्व ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड और अन्य क्षेत्रों में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

*निष्कर्ष: भारतीय संस्कृति की अमर धरोहर**

नुआखाई केवल एक क्षेत्रीय पर्व नहीं, बल्कि भारतीय कृषि संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, सामाजिक सद्भाव और आध्यात्मिक शुद्धि का संदेश देता है। जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था – **”जय जवान, जय किसान”** – इसी भावना को साकार करता है।

आइए, हम सभी इस पावन पर्व को मिलकर मनाएं और भारतीय संस्कृति की इस अमूल्य धरोहर को सँजोए रखें।

नुआखाई जुहार 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Author Profile

Amit Mishra
Latest entries

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *