*“सदी के मोड़ पर” : समय का निष्पक्ष मूल्यांकन*
(वायरलेस न्यूज छत्तीसगढ़)
समय कभी ठहरता नहीं—वह निरंतर बहती हुई एक ऐसी धारा है, जो अपने साथ घटनाओं, अनुभवों और विचारों का एक विराट संसार समेटे चलती है। हर युग, हर दशक और हर सदी अपने भीतर अनगिनत कथाएँ संजोए होती है, जिनमें समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के बदलते आयाम स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। ऐसे ही संक्रमणकाल में खड़े होकर जब कोई संवेदनशील और अनुभवी व्यक्तित्व अपने समय को देखता, परखता और शब्दों में ढालता है, तब वह केवल लेखन नहीं रह जाता—वह इतिहास का जीवंत दस्तावेज बन जाता है। “सदी के मोड़ पर” इसी अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण कृति है, जो अपने समय की नब्ज को पहचानने और उसे पाठकों तक पहुँचाने का गंभीर प्रयास करती है।
यह पुस्तक केवल लेखों का संकलन नहीं, बल्कि उस दौर की राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक हलचलों का साक्ष्य है, जब भारत एक नई सदी में प्रवेश कर रहा था। यह वह समय था, जब देश की राजनीति नए समीकरणों, नई चुनौतियों और नए नेतृत्व के साथ स्वयं को पुनर्परिभाषित कर रही थी। लेखक ने इस दौर की घटनाओं को केवल दर्ज नहीं किया, बल्कि उनके पीछे छिपे कारणों, परिणामों और दूरगामी प्रभावों का गहन विश्लेषण भी प्रस्तुत किया है। इस दृष्टि से यह कृति पाठकों को केवल सूचना नहीं देती, बल्कि उन्हें सोचने, समझने और प्रश्न करने के लिए प्रेरित करती है।
लेखक का यह प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपने राजनीतिक अनुभव और वैचारिक दृष्टि के बावजूद लेखन में संतुलन और तटस्थता बनाए रखने का प्रयत्न किया है। वे स्वयं राजनीति के सक्रिय क्षेत्र से जुड़े रहे, फिर भी उन्होंने घटनाओं को केवल व्यक्तिगत या दलगत दृष्टिकोण से नहीं देखा, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनका मूल्यांकन किया। यही कारण है कि इस पुस्तक के लेख समय के दस्तावेज के रूप में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखते हैं।
इस कृति में इतिहास के प्रति एक गहरी संवेदनशीलता भी दिखाई देती है। लेखक यह स्पष्ट रूप से संकेत करते हैं कि इतिहास केवल बीते हुए समय का लेखा-जोखा नहीं होता, बल्कि वह वर्तमान को समझने और भविष्य को दिशा देने का माध्यम भी होता है। यदि हम अपने अतीत की घटनाओं को भूल जाते हैं या उन्हें सही संदर्भ में नहीं समझते, तो हम भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में भी असमर्थ हो जाते हैं। इसलिए ऐसे लेखन की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है, जो समय की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को संजोकर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखे।
यह पुस्तक विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि इसकी भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और विचारोत्तेजक है। इसमें न तो शुष्क अकादमिकता का बोझ है और न ही केवल भावनात्मकता का अतिरेक। बल्कि यह दोनों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए पाठक को एक ऐसी बौद्धिक यात्रा पर ले जाती है, जहाँ वह स्वयं भी अपने समय के प्रति अधिक सजग और उत्तरदायी बनता है।
आज जब सूचना के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं और हर दिन नई-नई खबरें हमारे सामने आती हैं, तब भी ऐसे लेखों का महत्व कम नहीं होता। कारण यह है कि समाचार केवल घटनाओं की सूचना देता है, जबकि इस प्रकार का लेखन उन घटनाओं के अर्थ और प्रभाव को समझने में हमारी सहायता करता है। इस दृष्टि से “सदी के मोड़ पर” एक ऐसी कृति है, जो पाठकों को न केवल अपने समय से जोड़ती है, बल्कि उन्हें इतिहास, राजनीति और समाज के गहरे अंतर्संबंधों को समझने की दृष्टि भी प्रदान करती है।
अंततः कहा जा सकता है कि यह पुस्तक अपने समय की एक सशक्त अभिव्यक्ति है—एक ऐसा दर्पण, जिसमें हम न केवल बीते हुए दौर को देख सकते हैं, बल्कि वर्तमान की जटिलताओं और भविष्य की संभावनाओं को भी समझ सकते हैं। अख़बार के पाठकों के लिए यह अपने समय को समझने, प्रश्न करने और उसके साथ संवाद स्थापित करने का।
लेखक अजीत जोगी अपने विराट अनुभव संसार, अध्ययन की अतल गहराई, निष्पक्ष राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि, मन और मस्तिष्क के भीतर संवेदना का अनुपम समन्वय, छत्तीसगढ़ का भोलापन और अपने संघर्ष के ताप का निचोड़ इस पुस्तक में प्रस्तुत करते हैं।
*डॉ सुधीर शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार, रायपुर छत्तीसगढ़*
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