*काॅकरोच : हीनता का हल्ला*

*डॉ शाहिद अली*

( वायरलेस न्यूज छत्तीसगढ़) दिल्ली के जंतर-मंतर पर तथाकथित काॅकरोच
जनता पार्टी के नाम पर एक प्रदर्शन हो गया। हवाई जहाज़ से इसके संस्थापक कहे जाने वाले अभिजीत दीपके उतरे और देशभर के युवाओं से आह्वान किया कि वे इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनें। दीपके के इस बयान का कोई खास असर नहीं दिखा। काॅकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके शिक्षा, रोजगार और पेपर लीक मामले में युवाओं की भीड़ इकट्ठा करना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की एक टिप्पणी की ग़लत व्याख्या से बनाए गए माहौल का फ़ायदा उठाकर आनलाइन पार्टी का गठन हो गया।
जंतर-मंतर पर जो हो हल्ला हुआ उसमें जनता नहीं थी। एक ऐसी छोटी मोटी भीड़ थी जो अपनी हीनता और अकर्मण्यता को पूरे भारत में थोपना चाहती है। इस भीड़ में जो आक्रोश दिखाया जा रहा है वह वास्तव में युवाओं का नहीं है। यह शोर शराबा एक ऐसे तत्वों का है जो अराजकता में अपने अवसर ढूंढते हैं। व्यवस्था विरोधी परिस्थितियों को पैदा करते हैं। ज़ाहिर सी बात है ये ऐसे सिरफिरे हैं जो स्वयं हीन भाव से ग्रस्त हैं और अपनी असफलताओं का ठीकरा सरकार पर फोड़ते हैं। हीनता का भाव इनके अंदर है। नकारात्मक प्रभाव से कमजोरों को काॅकरोच जनता का लबादा पहनाना चाहते हैं, इसलिए पड़ोसी देशों के राजनीतिक उठा-पटक को भारत के युवाओं में एक अवसाद के जश्न की शक्ल देना चाहते हैं। हमारे देश में नेतृत्व का निर्माण सोशल मीडिया में ज़हर उगलने वाले अभिजीत दीपके की तरह नहीं होता है। भारत में नेतृत्व सेवा, त्याग और तपस्या से होकर गुजरता है इसलिए भारत का लोकतंत्र दुनिया में सबसे अद्भुत और शक्तिशाली है। एक संवैधानिक व्यवस्था में भारतीय जनता की आस्था है। हमारे देश का कानून और न्याय तंत्र जितना पारदर्शी और विश्वसनीयता लिए हुए है शायद ही ऐसा कोई दूसरा देश हो सकता है। सिस्टम में संतुलन और उदात्त मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा है। इसलिए काॅकरोच जनता कहकर इसका उपहास नहीं बनाया जा सकता है।
भारत में युवाओं के सपने गरीबी और अभावों के बीच भी पूरे होते हैं। युवाओं में जोश और उत्साह का जुनून अप्प दीपो भव की तरह है क्योंकि यहां भगवान गौतम बुद्ध की शिक्षा है और विवेकानंद का आदर्श है। इसलिए युवा शक्ति नए प्रकल्पों के साथ खड़ी है उनके मन में हार या हताशा का कोई कीड़ा नहीं है। एआई और नई टेक्नोलॉजी का परचम पूरे देश में है। खेत से लेकर खलिहानों तक और गांव से महानगरों तक युवा उर्जा से परिपूर्ण है। प्रतिभाशाली युवाओं को शिक्षा और रोजगार में अधिकाधिक अवसर मिल रहे हैं। राजनीति और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में युवा नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
अब सवाल उठता है कि आखिर इस तरह की हीनता के भाव से उपजी भीड़ को अचानक मीडिया में इतनी जगह कैसे मिल जाती है। ये हो हल्ला और मीडिया का इतना प्रचार क्यों ? क्या मीडिया भी ऐसे भीड़ तंत्र को ख़बर की खुराक समझता है या कोई दूसरी वजह है। सोशल मीडिया बेलगाम है। यूट्यूबर आत्ममुग्ध हैं। तार्किक विश्लेषण और सोशल रिस्पांसिबिलिटी की जगह अखबारों में भी कम होती जा रही है। अन्यथा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की टिप्पणियों को गंभीरता से लिया जाता है। लोकतंत्र में जन समुदाय का महत्व होता है जबकि भीड़ का कोई शास्त्र नहीं होता है। भीड़ अस्थाई होती है जबकि जन-समुदाय स्थायी होता है। मीडिया का काम जन-समुदाय को स्वतंत्र अभिमत और जनचेतना के सरोकारों से जोड़ना है अतः ऐसे सभी खतरनाक होती भीड़ का परिष्कार ज़रुरी है जो संवैधानिक व्यवस्थाओं को चुनौती देने या लोगों में निराशा पैदा करने की नाकाम कोशिशें करती हैं। मीडिया को हरपल सजग प्रहरी की भूमिका में रहना होगा। पोर्टल पत्रकारिता में जल्दबाजी है लेकिन तथ्यों की वास्तविक स्थिति तक पहुंचने का धैर्य नहीं। हमें ये देखने की सख़्त जरूरत है कि मीडिया अपने नैतिक मूल्यों की अनदेखी कर कोई नया बदलाव नहीं कर सकता है। सच को करीब से जानने, समझने और आडिएंस तक पहुंचाने में तमाम राजनीतिक प्रलोभनों से दूर होना पड़ेगा। हमें अपने युवा सपनों को हीनता के हल्ले से हर हाल में बचाना होगा, काकरोच की हीन भावना परोसने वाले युवाओं के आत्मबल को कमजोर नहीं कर सकते हैं। डॉ बशीर बद्र का यह बयां मौजूदा है –
उड़ान वालों उड़ानों पे वक़्त भारी है,
परों की नहीं अब हौसलों की बारी है।”
( *लेखक मीडिया शिक्षाविद् हैं )*

Author Profile

Amit Mishra - Editor in Chief
Amit Mishra - Editor in Chief
Latest entries

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *