*19 जून जयंती पर विशेष
*पं. माधवराव सप्रे : हिंदी निबंध विधा के उन्नायक**
दुर्लभ निबंधों के प्रकाश में उनके बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व की पुनर्खोज*

(वायरलेस न्यूज छत्तीसगढ़)

हिंदी साहित्य का इतिहास केवल कवियों और कथाकारों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन चिंतकों का भी इतिहास है जिन्होंने भाषा को विचार का माध्यम बनाया। पंडित माधवराव सप्रे ऐसे ही साहित्यकार हैं जिन्होंने हिंदी गद्य, पत्रकारिता और निबंध लेखन को नई दिशा प्रदान की। उनके निबंध केवल तत्कालीन समाज का दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि आज भी वैचारिक ऊर्जा, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व का स्रोत हैं।
‘पं. माधवराव सप्रे जी के दुर्लभ निबंध’ इस दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण कृति है। संकलनकर्ता डॉ. शंकर प्रसाद श्रीवास्तव ने अनेक पुरानी पत्रिकाओं, पुस्तकालयों और अभिलेखागारों से सप्रे जी के दुर्लभ निबंधों का संग्रह कर हिंदी जगत को एक अमूल्य धरोहर प्रदान की है। यह पुस्तक केवल एक संकलन नहीं, बल्कि हिंदी निबंध परंपरा के इतिहास की पुनर्स्थापना का गंभीर प्रयास है।
सप्रे जी को प्रायः हिंदी की पहली मौलिक कहानी “एक टोकरी भर मिट्टी” के कारण याद किया जाता है, किंतु यह पुस्तक उनके निबंधकार रूप को कहीं अधिक व्यापक और प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। इससे स्पष्ट होता है कि वे केवल कथाकार नहीं, बल्कि आधुनिक हिंदी निबंध के निर्माणकर्ताओं में अग्रणी थे।
विचार और कर्म का साहित्य
पुस्तक का पहला निबंध “आलस्य और प्रयत्न” पढ़ते ही पाठक सप्रे जी की चिंतन-शक्ति से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। वे केवल नैतिक उपदेश नहीं देते, बल्कि भारतीय दर्शन, गीता, संत साहित्य और जीवनानुभव के आधार पर यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य का विकास सतत प्रयत्न में निहित है। उनके लिए आलस्य व्यक्तिगत ही नहीं, राष्ट्रीय पतन का भी कारण है। आज जब युवा पीढ़ी त्वरित सफलता की मानसिकता से जूझ रही है, यह निबंध पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।
सप्रे जी का लेखन आदर्शवाद से प्रेरित है, परंतु वह यथार्थ से विमुख नहीं है। वे समाज, शिक्षा, राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर समान अधिकार से लिखते हैं। यही कारण है कि उनके निबंधों में विषयों की अद्भुत विविधता दिखाई देती है।
विषय-विस्तार का अप्रतिम उदाहरण
इस संकलन में शिक्षा, विश्वविद्यालय, राष्ट्रवाद, भारतीय समाज, जापान की प्रगति, बाल शिक्षा, राजभक्ति, इतिहास, विज्ञान, वनस्पति, पुरातत्त्व और सांस्कृतिक प्रश्नों पर लिखे गए निबंध शामिल हैं। अनुक्रम ही यह प्रमाणित करता है कि सप्रे जी का अध्ययन अत्यंत व्यापक था। वे केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि गंभीर समाजचिंतक और राष्ट्रीय विचारक भी थे।
विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि अनेक निबंध आज भी समकालीन प्रतीत होते हैं। विश्वविद्यालयों की स्थिति, शिक्षा की दिशा, राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका और आत्मनिर्भरता जैसे विषय आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने एक शताब्दी पहले थे।
भाषा की सहजता और विचारों की गंभीरता
सप्रे जी की भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है। वे कठिन दार्शनिक अवधारणाओं को भी सहज उदाहरणों से स्पष्ट कर देते हैं। संस्कृत, हिंदी और लोकजीवन के उदाहरणों का संतुलित उपयोग उनकी शैली को विशिष्ट बनाता है।
उनके निबंधों में अलंकारिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि विचार की स्पष्टता प्रमुख है। यही कारण है कि उनका लेखन आज भी पाठक को सीधे संबोधित करता है। वे पाठक को केवल जानकारी नहीं देते, बल्कि सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत
सप्रे जी का पूरा लेखन राष्ट्रीय पुनर्जागरण की भावना से ओतप्रोत है। वे स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय वैचारिक सहयोगी थे। उनके लेखों में राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक चेतना का प्रतीक है।
उनकी दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए उत्तरदायी नागरिक तैयार करना है। यही कारण है कि उनके निबंधों में नैतिकता, चरित्र, श्रम और स्वावलंबन पर विशेष बल मिलता है।
पत्रकारिता और निबंध का सुंदर समन्वय
सप्रे जी मूलतः पत्रकार भी थे। इसलिए उनके निबंधों में तथ्यात्मकता, तर्क और समसामयिकता का अद्भुत संतुलन मिलता है। वे विचारों को जीवन से जोड़ते हैं। उनके निबंधों में समाचार की तत्परता भी है और साहित्य की संवेदना भी।
यही विशेषता उन्हें आधुनिक हिंदी निबंध का सशक्त निर्माता सिद्ध करती है।
शोधार्थियों के लिए महत्त्वपूर्ण ग्रंथ
यह पुस्तक केवल सामान्य पाठकों के लिए नहीं, बल्कि शोधार्थियों और विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। हिंदी निबंध के विकास, हिंदी पत्रकारिता के इतिहास, राष्ट्रवादी चिंतन और आधुनिक हिंदी गद्य के अध्ययन में यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण स्रोत सामग्री सिद्ध होगी।
विशेष रूप से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि संकलनकर्ता ने वर्षों के शोध के बाद इन निबंधों को विभिन्न दुर्लभ पत्रिकाओं से खोजकर सुरक्षित किया है। यह कार्य स्वयं में एक सांस्कृतिक संरक्षण अभियान है।
संपादकीय दृष्टि की सफलता
डॉ. शंकर प्रसाद श्रीवास्तव का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने बिखरी हुई सामग्री को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने केवल संपादन नहीं किया, बल्कि हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य किया है।
भूमिका में भी यह स्पष्ट किया गया है कि इन निबंधों की खोज और प्रकाशन का उद्देश्य सप्रे जी के साहित्य को सुरक्षित रखना तथा नई पीढ़ी तक पहुँचाना है।
कश
प्रत्येक निबंध के साथ उसका ऐतिहासिक संदर्भ, प्रकाशन-काल, संक्षिप्त टिप्पणी और आवश्यक शब्दावली भी जोड़ दी जाए तो यह शोधार्थियों के लिए और अधिक उपयोगी हो सकती है। इसी प्रकार सप्रे जी के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता पर एक विस्तृत आलोचनात्मक भूमिका भी पुस्तक के मूल्य को बढ़ा सकती है।
आज की आवश्यकता
आज जब समाज सूचना की अधिकता और विचार की कमी से जूझ रहा है, तब सप्रे जी के निबंध हमें विवेक, श्रम, नैतिकता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की याद दिलाते हैं। वे बताते हैं कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज निर्माण का माध्यम भी है।
उनकी लेखनी आज भी हमें यह संदेश देती है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके जागरूक नागरिकों और उनके सतत प्रयास में निहित होती है।
पं. माधवराव सप्रे केवल हिंदी की पहली मौलिक कहानी के रचनाकार नहीं थे, बल्कि आधुनिक हिंदी निबंध विधा के सशक्त उन्नायक, दूरदर्शी चिंतक, राष्ट्रवादी पत्रकार और उत्कृष्ट गद्यकार भी थे।

पं. माधवराव सप्रे के निबंध आज भी उतने ही जीवंत हैं जितने अपने समय में थे, और यही किसी कालजयी निबंधकार की सबसे बड़ी पहचान है।

*डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़*

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Amit Mishra - Editor in Chief
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