बिलासपुर/(वायरलेस न्यूज) न्यायधानी के बहुचर्चित फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट प्रकरण में बिलासपुर पुलिस ने करीब 17 वर्ष पुराने घटनाक्रम की विस्तृत विवेचना पूरी करते हुए पूरे मामले की तस्वीर लगभग साफ कर दी है। पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह के निर्देशन में हुई बहुस्तरीय जांच में यह सामने आया कि डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम ने कथित रूप से फर्जी पहचान और कूटरचित दस्तावेजों के सहारे स्वयं को विशेषज्ञ हृदय रोग चिकित्सक के रूप में स्थापित कर अपोलो अस्पताल में सेवाएं दीं और अनेक मरीजों का उपचार किया। पुलिस ने आरोपी के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर न्यायालय में अभियोग पत्र प्रस्तुत कर दिया है। वहीं अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की भूमिका की अलग से की गई जांच के बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उनके संबंध में क्लोजर रिपोर्ट न्यायालय में पेश की गई है।समय और कैलेंडर
एसएसपी रजनेश सिंह ने बताया कि थाना सरकण्डा में दर्ज अपराध की विवेचना केवल आरोपी चिकित्सक तक सीमित नहीं रखी गई। जांच का दायरा बढ़ाकर यह भी परखा गया कि आरोपी की नियुक्ति किन परिस्थितियों में हुई, उसके दस्तावेजों का सत्यापन किस प्रकार हुआ और क्या अस्पताल प्रबंधन अथवा चयन समिति की कोई आपराधिक भूमिका सामने आती है। इसी उद्देश्य से धारा 173(8) के तहत आगे की विवेचना भी कराई गई।
जांच में खुलीं फर्जी पहचान की परतें

पुलिस विवेचना में सामने आया कि आरोपी ने स्वयं को एमबीबीएस, एमआरसीपी तथा इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में प्रशिक्षित विशेषज्ञ बताया था। मेडिकल काउंसिल से प्राप्त जानकारी में उसके विशेषज्ञ पंजीयन की पुष्टि नहीं हो सकी। दमोह में दर्ज प्रकरण की जांच में यह भी सामने आया कि उसने कथित रूप से “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से आधार कार्ड, पैन कार्ड सहित अन्य पहचान संबंधी दस्तावेज तैयार कराए थे। उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज से भी उसके नाम पर वैध शैक्षणिक रिकॉर्ड जांच में उपलब्ध नहीं मिला।

दमोह से प्रोडक्शन वारंट पर बिलासपुर लाकर पूछताछ के दौरान आरोपी ने स्वीकार किया कि वह अपोलो अस्पताल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत था तथा उसने अनेक मरीजों की एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की थी। हालांकि अपने दावों के अनुरूप विशेषज्ञता संबंधी आवश्यक दस्तावेज वह पुलिस के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर सका।

मरीजों की मौतों पर भी हुई जांच

विवेचना के दौरान पुलिस के सामने यह जानकारी भी आई कि आरोपी के कार्यकाल में उपचार प्राप्त करने वाले लगभग 27 मरीजों की मृत्यु हुई थी। हालांकि एसएसपी रजनेश सिंह ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में प्रमाणित अभिलेख अथवा पर्याप्त संख्या में पीड़ित सामने नहीं आए। केवल दो शिकायतकर्ताओं ने विधिवत आवेदन प्रस्तुत किया। ऐसे में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इन सभी मौतों को आरोपी की कथित फर्जी विशेषज्ञता से कानूनी रूप से जोड़ना संभव नहीं था।

आरोपी के खिलाफ चार्जशीट हो चुकी है पेश

पुलिस जांच में फर्जी दस्तावेज, कूटरचना, धोखाधड़ी और अवैध रूप से विशेषज्ञ चिकित्सक बनकर चिकित्सा कार्य करने के पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर आरोपी डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के विरुद्ध 27 जून 2025 को न्यायालय में अभियोग पत्र प्रस्तुत किया जा चुका है।

अस्पताल प्रबंधन की भूमिका की अलग जांच

एसएसपी रजनेश सिंह के अनुसार आरोपी के खिलाफ चालान पेश करने के बाद भी पुलिस ने जांच बंद नहीं की। अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की संभावित भूमिका की अलग से विवेचना जारी रखी गई। इस दौरान अपोलो अस्पताल से दोबारा पत्राचार किया गया, डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार से जानकारी ली गई, नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण किया गया तथा वर्ष 2006 के रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का प्रयास भी किया गया।

अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस को बताया कि नियुक्ति लगभग 17-18 वर्ष पूर्व हुई थी। उस समय रिकॉर्ड केवल हार्ड कॉपी में रखे जाते थे तथा रिकॉर्ड संरक्षण की निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद पुराने अभिलेख उपलब्ध नहीं रहे। इसी कारण अतिरिक्त दस्तावेज उपलब्ध कराना संभव नहीं हो सका।

विधिक राय के बाद कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट

पूरे प्रकरण की केस डायरी का परीक्षण वरिष्ठ अधिकारियों तथा जिला अभियोजन अधिकारी से कराया गया। पुलिस के अनुसार उपलब्ध दस्तावेज, गवाहों के कथन, पत्राचार और विधिक राय के परीक्षण के बाद ऐसा कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया जिससे यह सिद्ध हो सके कि अस्पताल प्रबंधन अथवा चयन समिति ने जानबूझकर या किसी आपराधिक षड्यंत्र के तहत आरोपी की नियुक्ति की थी। इसी आधार पर संबंधित पक्षों के संबंध में न्यायालय के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।

व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम

हालांकि पुलिस की जांच ने आरोपी चिकित्सक के विरुद्ध फर्जी पहचान, संदिग्ध दस्तावेजों और कथित धोखाधड़ी की परतें खोल दी हैं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने निजी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति, दस्तावेजों के सत्यापन और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं। यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक कथित रूप से विशेषज्ञ हृदय रोग चिकित्सक बनकर मरीजों का इलाज करता रहा, तो यह केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल है। पुलिस का कहना है कि जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर की गई है तथा जहां पर्याप्त प्रमाण मिले वहां अभियोजन किया गया और जहां साक्ष्य पर्याप्त नहीं मिले, वहां कानून के अनुरूप न्यायालय के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।

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Amit Mishra
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