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पाटजात्रा पूजा विधान के साथ 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व का हुआ शुभारंभ

On: August 8, 2021 2:48 PM
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जगदलपुर 08 अगस्त 2021
वायरलेस न्यूज अरुण पाढ़ी/
75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व का शुभारंभ पाटजात्रा पूजा विधान के साथ हो गया है। सावन अमावश्या के दिन जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर के समक्ष स्थित नगर गुड़ी में पाट जात्रा पूजा विधान पूरा किया गया। यहां माचकोट के जंगल से लाई गई साल की लकड़ी, जिसे ठूरलू खोटला कहा जाता है, की पूजा विधान के साथ शुरु हुई। इस अवसर पर संसदीय सचिव श्री रेखचंद जैन, अनुविभागीय दण्डाधिकारी श्री जीआर मरकाम सहित बस्तर दशहरा के आयोजन में अहम भूमिका निभाने वाले पुजारी, मांझी-मुखिया, चालकी उपस्थित थे।
उल्लेखनीय है कि बस्तर के ऐतिहासिक दशहरा पर्व की शुरुआत 1408 में राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा प्रारंभ की गई थी। 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा की शुरुआत हरेली अमावस्या से होती है। इसमें सभी वर्ग, समुदाय और जाति-जनजातियों के लोग हिस्सा लेते हैं। यह दशहरा बस्तर की आराध्य मां दंतेश्वरी माता के प्रति अगाध श्रद्धा झलकती है।
इस पर्व की शुरुआत हरेली अमावस्या को माचकोट जंगल से लाई गई लकड़ी ;ठुरलू खोटला पर पाटजात्रा रस्म पूरी करने के साथ होती है। इसके बाद बिरिंगपाल गांव के ग्रामीण सीरासार भवन में सरई पेड़ की टहनी को स्थापित कर डेरीगड़ाई रस्म पूरी करते हैं।
इसके बाद विशाल रथ निर्माण के लिए जंगलों से लकड़ी लाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। झारउमरगांव व बेड़ाउमरगांव के ग्रामीण रथ निर्माण की जिम्मेदारी निभाते हुए दस दिनों में पारंपरिक औजारों से विशाल रथ तैयार किया जाता है।
इस पर्व में काछनगादी की पूजा का विशेष प्रावधान है। रथ निर्माण के बाद पितृमोक्ष अमावस्या के दिन ही काछनगादी पूजा संपन्न की जाती है। इस पूजा में मिरगान जाति की बालिका को काछनदेवी की सवारी कराई जाती है। ये बालिका बेल के कांटों से तैयार झूले पर बैठकर रथ परिचालन व पर्व को सुचारु रूप से शुरू करने की अनुमति देती है।
दूसरे दिन गांव आमाबाल के हलबा समुदाय का एक युवक सीरासार में 9 दिनों की निराहार योग साधना में बैठ जाता है। ये पर्व को निर्विघ्न रूप से होने और लोक कल्याण की कामना करता है। इस दौरान हर रोज शाम को दंतेश्वरी मां के छत्र को विराजित कर दंतेश्वरी मंदिर, सीरासार चौक, जयस्तंभ चौक व गुरुनानक चौक से होते हुए रथ की परिक्रमा की जाती है।
रथ में माईजी के छत्र को चढ़ाने और उतारने के दौरान बकायदा सशस्त्र सलामी दी जाती है। पूरे पर्व में बस्तर की सभ्यता और संस्कृति के साथ ही परंपराएं भी झलकती हैं। इसमें कहीं भी मशीनों का प्रयोग नहीं किया जाता है। पेड़ों की छाल से तैयार रस्सी से ग्रामीण रथ खींचते हैं। इस रस्सी को लाने की जिम्मेदारी पोटानार क्षेत्र के ग्रामीणों पर होती है।
बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्मों में मावली परघाव भी है, जिसमें दंतेवाड़ा से पहुंची मावली माता का स्वागत भव्य तरीके से किया जाता है। निशा जात्रा, बाहर रैनी, भीतर रैनी, मुरिया दरबार एवं मावली बिदाई रस्म को लेकर भी यहां के जनमानस में अपार उत्साह दिखाई देता है। बस्तर की सभ्यता-संस्कृति, समन्वय, लोकाचार, उत्साह को देखने के लिए बाहर के पर्यटक भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

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Amit Mishra
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