*श्रीकांत वर्मा : स्मृति, संघर्ष और समय का कवि*
(वायरलेस न्यूज छत्तीसगढ़) 25 मई हिंदी साहित्य के लिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आधुनिक हिंदी कविता के एक महत्त्वपूर्ण स्वर को स्मरण करने का दिन है। आज ही के दिन हिंदी के विशिष्ट कवि, कथाकार, चिंतक और पत्रकार श्रीकांत वर्मा ने इस संसार से विदा ली थी। उनका साहित्य आज भी हमारे समय की बेचैनी, राजनीति की विडंबना और मनुष्य की आंतरिक त्रासदी का सजीव दस्तावेज़ बना हुआ है।
18 सितंबर 1931 को बिलासपुर में जन्मे श्रीकांत वर्मा ने हिंदी साहित्य को आधुनिक संवेदना और वैचारिक तीक्ष्णता से समृद्ध किया। वे केवल कवि नहीं थे, बल्कि अपने समय के सजग साक्षी भी थे। पत्रकारिता और राजनीति से सक्रिय रूप से जुड़े रहने के कारण उनकी कविताओं में सत्ता, इतिहास और मनुष्य के संबंधों का गहरा विवेचन मिलता है। वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई।
श्रीकांत वर्मा की कविता का सबसे बड़ा गुण उसका आत्मसंघर्ष और वैचारिक बेचैनी है। उनकी कविताएँ किसी रोमानी संसार का निर्माण नहीं करतीं, बल्कि हमारे समय की विडंबनाओं से सीधा सामना कराती हैं। “मगध” उनका सर्वाधिक चर्चित काव्य-संग्रह है, जिसने हिंदी कविता को एक नई दिशा दी। “मगध” में इतिहास केवल अतीत नहीं है, बल्कि वर्तमान का रूपक बनकर सामने आता है। सत्ता, भय, हिंसा और मनुष्य की पराजय का जो चित्र वहाँ मिलता है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक प्रतीत होता है। इस कृति के लिए उन्हें मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
उनके अन्य प्रमुख काव्य-संग्रहों में “भटका मेघ”, “मायादर्पण”, “दिनारंभ” और “जलसाघर” उल्लेखनीय हैं। उनकी भाषा में एक अद्भुत सादगी है, किंतु वही सादगी भीतर गहरे तक चोट करती है। वे कम शब्दों में बड़ी बात कहने वाले कवि थे। उनकी कविताओं में अकेलापन, भय, असुरक्षा और समय की निरर्थकता बार-बार उभरती है।
श्रीकांत वर्मा केवल कवि ही नहीं, एक महत्त्वपूर्ण कथाकार और आलोचक भी थे। “दूसरी बार” उनका चर्चित उपन्यास है, जबकि “झाड़ी” और “संवाद” जैसी कहानियाँ उनके गद्य लेखन की शक्ति को प्रमाणित करती हैं। साहित्य के साथ-साथ उन्होंने पत्रकारिता में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। “दिनमान” जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका से उनका जुड़ाव हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
आज जब समाज और राजनीति में लगातार असहिष्णुता, भय और वैचारिक भ्रम बढ़ रहे हैं, तब श्रीकांत वर्मा की कविताएँ और अधिक प्रासंगिक हो उठती हैं। उनकी रचनाएँ हमें सच बोलने का साहस देती हैं और यह याद दिलाती हैं कि साहित्य केवल सौंदर्य का नहीं, बल्कि प्रतिरोध का भी माध्यम है।
उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना दरअसल उस चेतना को स्मरण करना है जो मनुष्य और समय के बीच छिपे हुए सच को उजागर करती है। हिंदी साहित्य सदैव उनका ऋणी रहेगा।
*डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिलाई छत्तीसगढ़*
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