(वायरलेस न्यूज नेटवर्क)

औद्योगिक युग चालू होने के बाद पृथ्वी का औसत तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। यूएनईपी के अनुसार इसी गति से ग्रीनहाउस गैस

उत्सर्जन करते रहे तो वर्ष 2027 तक तापमान 1.5 डिग्री बढ़ जाएगा, 2041 तक 2 डिग्री। वैज्ञानिकों के अनुसार ‘1.5 डिग्री कोई सेफ लेवल नहीं है। 2 डिग्री पहुंचने के बाद हम अज्ञात की ओर जाने वाली अप्रिय और भयानक यात्रा चालू कर देंगे।‘ 2014 के बाद जन्म लिया बच्चा, 1960 में जन्म लिए बच्चे से 36 गुना अधिक हीट वेव्स अनुभव करेगा। पृथ्वी ह्रदय घात सहित तीसरे स्तर के कैंसर से ग्रसित होकर, तेज बुखार से तप रही है, सभी बीमारियां हो गई हैं। आइए जानते हैं कि पृथ्वी की इन बीमारियों का विश्व में क्या असर पड़ेगा।

*वेट बल्ब तापमान:* मानव शरीर, अधिक तापमान पर भी शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में सक्षम रहता है। परंतु अधिक तापमान और अधिक आद्रता इन दोनों के साथ होने के कारण पसीना सूख नहीं पाता, शरीर का तापमान नियंत्रित नहीं हो पाता। इस स्थिति को वेट बल्ब सेल्सियस थर्मामीटर से नापा जाता है। मानव इसके 27 डिग्री तापमान तक आरामदेह रहता है, 32 डिग्री होने पर मजबूत आदमी भी बाहरी कार्य नहीं कर सकता, 35 डिग्री होने पर मानव जिन्दा नहीं रह सकता। मुंबई में अप्रैल 2023 में एक सम्मेलन के दौरान इसी कारणवश 14 मौतें हुई, आश्चर्यजनक रूप से तब तापमान और आद्रता अधिक नहीं थी। प्रोफेसर बिल मेकवायर के अनुसार बाद के दशकों में पर्शियन गल्फ, दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया, चीन यह खामियाजा भुगतेंगे, विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप। बाद के दशकों में 35 डिग्री पहुंचने पर मुख्य शहरों जैसे लखनऊ और पटना में व्यापक मौतें होंगी, 120 करोड़ लोग 31 डिग्री तापमान महसूस करेंगे। परंतु आज ही भारत के पूर्वी तट के कई शहरों में यह तापमान 30 से 32 डिग्री छू रहा है। भारत के लिए बड़ा खतरा 80% वर्क फोर्स का खुले में काम करना है।

*रोगवाहक कीट जनक बिमारियाँ:* विश्व की 80% आबादी मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जायका वायरस, येलो फीवर, जापानी इंसेफलाइटिस, हाथीपांव रोग, सिस्टोसोमियासिस, चगास रोग में से किसी एक बिमारी के खतरे में रहती है, 50% आबादी इनमें से 2 बिमारियों के खतरे में। विश्व में हुई 17% मौतों, बिमारियों और अपंगता का कारण ये हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा वैसे वैसे ये बिमारियों उन इलाकों में पहुंचने लगेंगी जहां यह कभी नहीं थी। इटली, क्रोशिया अफगानिस्तान में डेंगू रिपोर्ट किया गया है। फ्रांस, बुल्गारिया, हंगरी, जर्मनी में मलेरिया और डेंगू का गरम तापमान पर संचरण बढ़ेगा। नए इलाकों में पहुंचने के कारण और 360 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। ये बिमारियों क्रॉनिक और असक्षम करने वाली रहेंगी।

*वायरस:* पर्माफ्रोस्ट विश्व के उन स्थानों को बोलते हैं जहां बर्फ कड़क हो जाती है, पेड़ पत्तियां गिरने के बाद और जीव जंतु दफन होने के बाद सड नहीं पाते। तापमान बढ़ने से पर्माफ्रोस्ट घटने लगे हैं। वायुमंडल में जितनी कार्बन डाइऑक्साइड है उससे दुगनी पर्माफ्रोस्ट में दबी हुई है, पर्माफ्रोस्ट घटने से यह मिथेन बन कर जलवायु परिवर्तन में तीव्रता लाएगा। 2020 के मेडिसिन के नोबेल विजेता डॉ माइकल होटन ने चेतावनी दी है कि पर्माफ्रोस्ट में करोड़ों वायरस दफन है, पर्माफ्रोस्ट घटने से ये करोड़ों वायरस सक्रिय हो जाएंगे, जिससे नई महाबिमारियां पैदा होगी

*एंटीबायोटिक प्रतिरोध:* एंटीबायोटिक ने असंख्य जानें बचाई हैं। परंतु इनका अधिक उपयोग, इनके लिए प्रतिरोध (रेसिस्टेंस) पैदा करता है। बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया में, एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस के बढ़ने का संबंध जलवायु और वातावरण के तापमान से है। उच्च तापमान और बैक्टीरिया में रेसिस्टेंस का उच्च स्तर मानव में सबसे आम संक्रमणों में से कुछ का कारण बनता है। अनुमान है कि सदी के मध्य तक प्रति वर्ष दसियों लाख मौतों एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस के कारण होंगी।

*खाद्य और पोषण:* तापमान बढ़ने से फसलों की उपज तो प्रभावित होगी ही, उसमें पोषण (न्यूट्रीशन) भी कम होगा। फसलों में जिंक और प्रोटीन की मात्रा कम होगी, जिससे बच्चों की मृत्यु दर बढ़ेगी। सिर्फ चांवल की बात करें तो बी-विटामिन की कमी होने से 13 करोड लोग प्रभावित होंगे, इससे एनीमिया के अलावा बच्चों में तांत्रिक नली दोष उत्पन्न होता है। विटामिन बी-1 की कमी से 6.7 करोड़ लोग प्रभावित होंगे इससे ह्रदय, मस्तिष्क और तंत्रिका आघात होती है। आयरन की कमी होने से एनीमिया, मातृ और बाल मृत्यु दर में बढ़ोतरी होगी और कार्यक्षमता प्रभावित होगी। तापमान बढ़ने से परागण करने वाले कीड़ों की विलुप्ति से भी फसलें प्रभावित होगी।

अभी भी पूरा नहीं बिगड़ा है, पूरी दुनिया को विशेष रूप से नई पीढियों को जागरूक हो कर नेताओं से मांग करनी पड़ेगी कि वे ग्रीन हो कर अप्रत्याशित कदम उठाए, पृथ्वी के साथ उत्पात और शाब्दिक चतुराई बंद करें या फिर हट जायें। तीन चीजें ध्यान रखिये अनावश्यक उपभोग, अनावश्यक धन उत्पादन, धन का प्रदर्शन इसके नियंत्रण से व्यक्तिगत रूप से हम जलवायु संकट कम करने में सहयोग कर सकते है।
(अधिकांश जानकारी ग्रेटा थनबर्ग द्वारा बनाई गई ‘द क्लाइमेट बुक’ से)