मन लागो मेरो यार मुफ्तखोरी में

पता नहीं मेरा मन मुफ्तखोरी की ओर कैसे लग गया?ईमानदारी से पत्रकारिता कर रहा था।एक-एक समाचार के लिए मैं खूब मेहनत करता था पर सब कुछ बेकार चला गया।मेरा आदर्श,सिद्धांत डोल गया और मैं मुफ्तखोरी की राह पर लग गया या लगा दिया गया।
बड़ी-बड़ी कंपनियां वर्ष में एक बार पत्रकारों को मैनेज करने के लिए कीमती तोहफे दिया करती थीं।सारे श्रमजीवी इनके तोहफों को स्वीकार करते थे तो मैं ही कैसे इंकार कर सकता था?मैं भी लिया और बन गया मुफ्तखोर।
तोहफों का दौर शुरू हुआ तो बिना तोहफे के समाचार नीरस और बेगार लगने लगे।गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को मुफ्त में पैंतीस किलो चावल राशन दुकान के माध्यम से सरकार देने लगी तो श्रीमती जी ने गला धर दबाया।हमने कहा कि हम तो गरीबी रेखा के नीचे नहीं आते।तब वे बोलीं- आप न सही हम तो गरीबी रेखा में आते हैं।कोई काम नहीं करती हूं जिससे आय हो। आपको वेतन मिलता है पर हम क्या मिलता है ठेंगा।इसलिए आप हमारा राशनकार्ड बनवा दीजिये।
खाद्य अधिकारी ने एक दिन हमारा उदास चेहरा देखा तो पूछ लिया-क्या बात है?हमने बताया कि श्रीमती गरीबी रेखा के नीचे आना चाहती हैं।वे मुस्कुराए और बोले- इसमें कौन सी परेशानी है पार्टनर।मैं अभी राशनकार्ड बना देता हूं।इसके लिए उदास होने की कोई जरूरत नहीं है।
उन्होंने आगे कहा कि आपको पता है ज्यादातर गरीबी रेखा के ऊपर के लोग ही राशन कार्ड नीचे के बनावाए हैं।उनकी आय का ग्राफ राशन कार्ड के लिए गिर गया है पर वे आयकर दाता की सूची में चढ़े हुए हैं।जो अवसर पर गिर नहीं सकता वह कभी ऊपर उठ नहीं सकता।हमको संतोष हुआ कि चलो हम ही गलत काम नहीं करा रहे हैं ,हमारे से धुरंधर लोग पहले से ही गलत काम करा चुके हैं।
अन्य मासिक सामानों की जब लिस्ट मिलती है तो उसमें साफ लिखा रहता है-हेंडवास वही लाना जो एक खरीदने पर एक फ्री मिलता है।नहाने का साबुन भी ‘ गेट वन बुई टू’ लेना।मॉल में बच्चों के लिए नए कपड़े लेने गए तो पाया एक पेंट खरीदो दूसरा फ्री पाओ।यहां तक एक चड्डी लेने पर एक फ्री मिला।
आजकल राशन सामग्री की खरीदी में भी मुफ्त की योजनाएं हैं।दस हजार की सामग्री खरीदने पर पांच किलो अरहर की दाल बिल्कुल मुफ्त।पांच हजार की सामग्री खरीदने पर पांच किलो आलू और दो किलो प्याज फ्री।
ब्रश, टूथपेस्ट,जूते तक एक के साथ एक फ्री मिल जाते हैं।इस तरह हमें धीरे-धीरे फ्री की आदत पड़ गई।अब तो वही चीजें खरीदते हैं जिसमें एक फ्री मिलता है।दुकानदार भी अपने ग्राहकों को बताता चलता है कि हेयर ऑयल यह खरीदिये एक फ्री मिलेगा।आफ्टर शेविंग लोशन की इस कंपनी ने योजना शुरू की है।यह चाय खरीदिये इसमें कप फ्री है।
आज यह मुफ्तखोरी की आदत सर्वव्याप्त है।अड़ोस- पड़ोस के लोग इस मामले में बहुत अच्छे सूचना तंत्र हैं।वे फौरन बता देते हैं कि क्या खरीदने में फायदा है।उनके घरों में चम्मच,कटोरियां, ग्लास,प्लेट भी फ्री मिले हुए होते हैं।फ्लेट की खरीदे में भी अब कॉलोनाइजर सोने-चांदी के सिक्के बांटने लगे हैं।
हम भयभीत होने लगे हैं इस फ्री की संस्कृति से।हमें लगने लगा है कि यह मुफ्तखोरी बहुत जल्द हरामखोरी में बदल जाएगी और सामने न सही पीठ पीछे हरामखोर कहलाने लगेंगे।हम श्रीमती जी को यह समझा नहीं पाते कि मुफ्त कुछ भी नहीं मिलता।जो भी मिलता है उसकी पूरी कीमत वसूली जाती है।बचो भाग्यवान इस मुफ्तखोरी की संस्कृति से।वे समझें भी कैसे,इधर समझाने वाले हम अकेले हैं जबकि अड़ोस-पड़ोस की सारी महिलाएं उन्हें फ्री संस्कृति के फायदे समझा जाती हैं।

Author Profile

Amit Mishra - Editor in Chief
Amit Mishra - Editor in Chief
Latest entries