*निजी विश्वविद्यालयों में पीएचडी सुपरविजन में भ्रष्टाचार, पीएचडी शोध व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न*
रायपुर (वायरलेस न्यूज) छत्तीसगढ़ राज्य के निजी विश्वविद्यालयों में पीएचडी सुपरवाइजर एवं को-सुपरवाइजर नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर विगत वर्षों में अनेक गंभीर प्रश्न सामने आए हैं, जो राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था एवं शोध की गुणवत्ता के लिए अत्यंत चिंता का विषय हैं।
शैक्षणिक जगत में यह स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है कि कई संस्थानों में शोध मार्गदर्शन प्रणाली में विषय-संगतता, योग्यता एवं अनुभव की अनदेखी की जा रही है।
अनेक मामलों में शोधार्थियों के अंतिम ओपन परीक्षा से ठीक पूर्व असंबंधित विषयों के शिक्षकों को को-सुपरवाइजर नियुक्त कर दिया जाता है, ताकि संबंधित प्रोफेसर पदोन्नति हेतु अपनी योग्यता सूची में इसका उपयोग कर सकें। इस प्रकार की प्रवृत्ति से शोध की निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं विश्वसनीयता पर लगातार प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, और यह स्थिति छत्तीसगढ़ प्रदेश में सामान्य होती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ शोध को ज्ञान-सृजन का सशक्त माध्यम बनाने के बजाय मात्र औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित कर देती हैं। इसका सीधा दुष्प्रभाव शोधार्थियों के शैक्षणिक भविष्य पर पड़ता है तथा समाज में शिक्षा व्यवस्था की साख भी कमजोर होती है।
ऐसी अनियमितताएँ ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ शिक्षकों तथा परिश्रमी शोधार्थियों के साथ अन्याय हैं, जो नियमों का पालन करते हुए उच्च अकादमिक मानकों को बनाए रखने का निरंतर प्रयास करते हैं।
बुद्धिजीवी वर्ग एवं शिक्षाविदों की यह अपेक्षा है कि निजी विश्वविद्यालयों में पीएचडी मार्गदर्शन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी एवं गुणवत्ता-आधारित बनाया जाए, ताकि शोध वास्तव में समाज एवं राष्ट्र के विकास में प्रभावी भूमिका निभा सके।
जनसमाज एवं शिक्षा मंत्रालय से भी अपील की जाती है कि वह उच्च शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़े इन महत्वपूर्ण विषयों पर सजग रहे, सकारात्मक संवाद को प्रोत्साहित करे तथा अकादमिक मूल्यों की रक्षा में सक्रिय सहभागिता निभाए।
संजय सिंह ठाकुर
अध्यक्ष
छत्तीसगढ आरटीआई एक्टिविस्ट एसोसिएशन
रायपुर
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