ईच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, मानव गरिमा और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में ऐतिहासिक निर्णय – अधिवक्ता भगवानू नायक
रायपुर, रायपुर छत्तीसगढ़ ( वायरलेस न्यूज 12 मार्च 2026) सामाजिक न्याय कार्यकर्ता अधिवक्ता भगवानू नायक ने कहा देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 12 वर्षों से कोमा में रह रहे एक युवक को चिकित्सकीय परिस्थितियों के आधार पर पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दिया जाना भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और मानव गरिमा के सिद्धांतों की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक निर्णय है। यह निर्णय उस स्थिति में लिया गया है जब चिकित्सकीय विशेषज्ञों द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि मरीज के स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं है और वह लंबे समय से स्थायी कोमा की अवस्था में है।
अधिवक्ता भगवानू नायक ने उक्त निर्णय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के ऐतिहासिक निर्णयों—अरुणा शानबाग प्रकरण एवं कॉमन कॉज बनाम भारत संघ—में स्थापित सिद्धांतों को आगे बढ़ाते हुए यह स्पष्ट किया है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत केवल जीवन का अधिकार ही नहीं बल्कि गरिमा के साथ जीवन और मृत्यु का अधिकार भी निहित है। जब चिकित्सा विज्ञान यह स्पष्ट कर दे कि रोगी के स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं है और वह केवल कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरणों के सहारे जीवित है, तब ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक हो जाता है।
अधिवक्ता भगवानू नायक ने कहा सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रकार के मामलों में दुरुपयोग की संभावना को रोकने के लिए कठोर प्रक्रिया भी निर्धारित की है, जिसमें विशेषज्ञ चिकित्सकों के मेडिकल बोर्ड की राय, परिवार की सहमति तथा समुचित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य किया गया है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी परिस्थिति में मानव जीवन की गरिमा और संवैधानिक मूल्यों से समझौता न हो।
उन्होंने कहा कि यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की संवेदनशीलता, मानवीय दृष्टिकोण और संविधान के मूल सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह फैसला उन परिवारों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है जो लंबे समय से असाध्य रोग या स्थायी कोमा की स्थिति से जूझ रहे अपने परिजनों के संबंध में कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।
अंत में अधिवक्ता भगवानू नायक ने कहा कि न्यायालय का यह निर्णय चिकित्सा नैतिकता, मानव अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो भविष्य में ऐसे मामलों में मार्गदर्शक सिद्ध होगा।
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- अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
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