उदन्ती सीतानदी टाइगर रिजर्व के अंतिम बचे वन भैंसे छोटू की शुद्धता जांच की मांग पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) ने अपर मुख्य सचिव (वन) को लिखा भविष्य में सिंघवी के पत्रों का संज्ञान न ले। सिंघवी ने इसे लोकतंत्र में उनकी आवाज दबाने की कोशिश बताया।

रायपुर (वायरलेस न्यूज 18 मार्च) वर्षों से उदंती–सीतानदी टाइगर रिजर्व में रखे गए वन भैंसे छोटू को वन विभाग द्वारा उदंती का अंतिम शुद्ध नस्ल का जंगली भैंसा बताया जा रहा है। डिप्टी डायरेक्टर उदंती–सीतानदी टाइगर रिजर्व से पूछने पर कि किस आधार पर छोटू को शुद्ध नस्ल का जंगली भैंसा बताया जा रहा है, डिप्टी डायरेक्टर ने एक डीएनए रिपोर्ट दी उसमे कहीं नहीं लिखा है कि छोटू शुद्ध नस्ल का जंगली भैंसा है और और न ही डीएनए रिपोर्ट इस दावे की पुष्टि करती है।

वन विभाग जिस डीएनए रिपोर्ट का हवाला देता है, उसका अध्ययन करने पर यह सामने आता है कि उस रिपोर्ट में केवल उदंती क्षेत्र के जंगली भैंसों के आनुवंशिक आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं। रिपोर्ट में कहीं भी किसी एक भैंसे को शुद्ध नस्ल घोषित नहीं किया गया है। रिपोर्ट मुख्यतः भैंसों के बीच आनुवंशिक विविधता (genetic variation) और समानता/असमानता को दर्शाती है, न कि किसी एक भैंसे की शुद्धता (purity) का प्रमाण प्रस्तुत करती है। ऐसे में छोटू वन भैंसे को अंतिम शुद्ध नस्ल का जंगली भैंसा बताना वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। छोटू को वास्तव में शुद्ध नस्ल का जंगली भैंसा बताया जा रहा है, तो इसके लिए स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण और विशेषज्ञों की अधिकृत व्याख्या सार्वजनिक की जानी चाहिए।

छोटू की शुद्धता की जांच की मांग पर शासन ने दिए थे परीक्षण के आदेश:

दर असल वन विभाग बरनावापारा अभयारण्य में रखी गई असम से लाई गई मादाओं मे से दो मादा जंगली भैंसों को उदंती–सीतानदी टाइगर रिजर्व लाकर शुद्ध नस्ल का बताए जा रहे छोटू वन भैसे के साथ प्रजनन कराने की तैयारी मे है। ऐसे में यह आवश्यक है कि पहले डीएनए रिपोर्ट की वैज्ञानिक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर ली जाए । अगर अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष के बिना छोटू के साथ असम की शुद्ध नस्ल की मादा वन भैसों से प्रजनन कराया जाता है और बाद में वैज्ञानिक निष्कर्ष में छोटू शुद्ध नस्ल का नहीं पाया तो इससे उत्पन्न संतानों की आनुवंशिक शुद्धता पर प्रश्न उठेंगे। इसलिए रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने शासन को पत्र लिख कर छोटू के शुद्धता की जाच की मांग थी जिसपर शासन ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को दावों का परीक्षण करने के लिए आदेशित किया है। शासन के पत्र के जवाब में प्रधान मुख्य संरक्षक (वन्यजीव) जो कि डीएनए के विशेष नहीं हैं बिना किसी वैज्ञानिक संस्थान से जांच करवाए, अपर मुख्य सचिव को लिखा कि छोटू शुद्ध नस्ल का है और भविष्य में नितिन सिंघवी के उक्त विषय के सम्बन्ध में संज्ञान न लेने के लिए पत्र लिखा है।

वन्यजीव प्रेमियों की आवाज दबाने की कोशिश है यह

सिंघवी ने वन विभाग पर आरोप लगाया है कि शासन को नागरिकों की आवाज न सुनने की अनुशंशा कर वन विभाग वन्यजीव प्रेमियों की आवाज दबाने का प्रयत्न कर रहा है जो कि स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं के विरुद्ध है। वन विभाग सूचना का अधिकार के तहत जानकारी देने में अडंगा पैदा कर रहा है ता कि वन्यजीव प्रेमी विभाग की गलतियों पर आवाज नहीं उठा सके।

छोटू की उम्र नहीं बढ़ रही, क्या है कारण?

छोटू की उम्र दस्तावेजों में अभी भी 21 वर्ष दर्ज की जा रही है ताकि यह बताया जा सके कि वह प्रजनन योग्य है। दिसम्बर 2025 मे हुई बैठक के मिनिट्स मे उसे 21 वर्ष का बताया गया है। जबकि 2023 मे सूचना का अधिकार के तहत दिए गए दस्तावेजों मे भी उसे 21 वर्ष का बताया गया था। इस प्रकार अबवह 24 वर्ष का हो गया है। वन भैंसों की जंगल मे उम्र अधिकतम 18-20 पहुँच पाती है, कैद में जंगली भैंसे सामान्यतः 20–26 वर्ष तक जीवित रहते हैं। छोटू को भी बाड़े में कैद कर के रखा गया है।

क्या छोटू से प्रजनन करवाया जा सकता है?

छोटू उम्र के अंतिम दौर मे है उसकी उम्र 24 वर्ष से अधिक हो गई है, उम्र बढ़ने के साथ प्रजनन क्षमता काफी कम हो जाती है। शुक्राणुओं (वीर्य) की गुणवत्ता कम हो सकती है। छोटू को उम्र के कारण दिखाई नहीं देता। 2023 की वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह उल्लेख मिलता है कि 2023 से कुछ साल पहले छोटू के साथ प्रजनन का प्रयास किया गया था, जो विफल रहा। वन विभाग वर्षों से छोटू पर कई प्रयोग करने का विचार करता रहा है। कभी उसका वीर्य निकाल कर आर्टिफिसल इन्सेमीनैशन करवा कर प्रजनन करवाने का, कभी उसका शुक्राणु संरक्षित करने का। उम्र को देखते हुए अब शुक्राणु संरक्षण का विचार छोड़ दिया गया है। यदि मानव जीवन से तुलना की जाए तो छोटू 75 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति के बराबर माना जा सकता है जिस अवस्था में प्रजनन क्षमता स्वाभाविक रूप से काफी कम हो जाती है।

कई महत्वपूर्ण प्रश्न

सिंघवी ने वन विभाग से पूछा है कि:-
(1) वर्ष 2020 से असम से मादा लाकर बारनवापारा में बाड़े में बंधक बना कर रखी गई है, अब छ: साल बाद वन विभाग को उदंती ले जाकर छोटू से प्रजनन कराने की याद क्यों आई? छ: साल तक क्या कर रहे थे?
(2) 2017 मे मेनका और रंभा को वन भैंसी के नाम से रु 27 हजार मे खरीदे जाने से पहले उनका डीएनए जांच क्यों नहीं कराई गई? अगर रु 27 हजार मे दो वन भैंसी मिल रही थी तो विभाग ने और वन भैंसी क्यों नहीं खरीदी?
(3) मेनका और रंभा से और उनके बच्चों से हुए जिन 18-20 हाइब्रिड वन भैंसों को वर्षों तक बाड़े मे रख जनता को बताया जाता रहा कि वंश वृद्धि हो रही है वे अब कहां हैं? क्या वो मर गए हैं या जिंदा हैं? उनका प्रोफाइल क्यों नहीं बनाया गया? उनकी शुद्धता क्यों नहीं जांची गई? और अगर वे वन भैंसा नहीं थे हाइब्रिड थे तो इतने साल पाल कर जनता का रु. 2.5 करोड़ क्यों बरबाद किया? गौरतलब है कि 2024-25 तक इन पर रु. 2,46,38,831 खर्च किया गया था। जानकारी के अनुसार हाइब्रिड वन भैंसों को उदंती–सीतानदी टाइगर रिजर्व से इतनी दूर बहार खदेड़ दिया गया है कि वो वापस लौट नहीं सकें ताकि जांच होने पर वन विभाग की और पोल नहीं खुल जाए।

और कितना खर्च होगा?

सिंघवी ने वन विभाग से सवाल किया है कि उदंती में हाइब्रिड वन भैंसों पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, जंगल सफारी में 2017 से कैद दीप आशा (मुर्रा भैंसा) पर प्रजनन के लिए लगभग 1 करोड़ रुपये और उसके बाड़े पर करीब 2.5 करोड़ रुपये खर्च किए गए, इसके अलावा हर साल का अलग खर्च भी होता है। असम से लाए गए वन भैंसों पर भी करोड़ों रुपये खर्च हुए, फिर भी कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। ऐसे में विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या राजकीय पशु के नाम पर जनता को गुमराह किया गया?

नितिन सिंघवी
9826126200

Author Profile

Amit Mishra - Editor in Chief
Amit Mishra - Editor in Chief

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *