तुलसी साहित्य भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर : डॉ. विनय पाठक
तुलसीदास ने श्रीराम के चरित्र के माध्यम से न्याय, नीति, कर्तव्य, करुणा और मर्यादा के आदर्श प्रस्तुत किए हैं (पूर्व न्यायाधीश, छ.ग.उच्च न्यायालय न्यायमूर्ति डॉ. चंद्रभूषण बाजपेयी)
तुलसी भारतीय चेतना के महामनीषी, रामचरितमानस में लोकमंगल और जीवन मूल्यों का संदेश
बिलासपुर। (वायरलेस न्यूज) सागा लेआउट शुभम विहार स्थित ओंकारेश्वर महादेव मंदिर परिसर में 19 अगस्त को तुलसी जयंती समारोह का भव्य आयोजन किया गया। समारोह में रामभक्ति, साहित्य और भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। तुलसी साहित्य विमर्श, विराट कवि सम्मेलन, भक्तिमय प्रस्तुतियों और प्रतिभाओं के सम्मान ने आयोजन को गरिमामय बना दिया।
समारोह के मुख्य अतिथि रामलाल बरेठ ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के माध्यम से भारतीय समाज को भक्ति के साथ संस्कार, मर्यादा, कर्तव्य और लोकमंगल का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि तुलसी साहित्य आज भी समाज को दिशा देने की क्षमता रखता है।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. रमेशचंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि तुलसी केवल कवि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के ऐसे महामनीषी हैं, जिन्होंने श्रीराम के चरित्र में संपूर्ण मानवता के आदर्शों को प्रतिष्ठित किया। रामचरितमानस केवल पाठ करने का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला दिव्य मार्गदर्शक है।
अतिविशिष्ट अतिथि डॉ. विनय कुमार पाठक, थावे विद्यापीठ विश्वविद्यालय गोपालगंज, बिहार एवं पूर्व अध्यक्ष छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ने कहा कि “तुलसी साहित्य भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।” उन्होंने कहा कि रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन, लोकमंगल और मानवीय मूल्यों का विश्वकोश है। उन्होंने तुलसी साहित्य को नई पीढ़ी तक नई भाषा और नए माध्यमों से पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
पूर्व न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय न्यायमूर्ति डॉ. चंद्रभूषण बाजपेयी ने कहा कि तुलसीदास ने श्रीराम के चरित्र के माध्यम से न्याय, नीति, कर्तव्य, करुणा और मर्यादा के आदर्श प्रस्तुत किए हैं। मानस का संदेश आज के समाज में भी उतना ही प्रासंगिक है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. श्याम लाल निराला, पूर्व प्राचार्य जेपी महाविद्यालय बिलासपुर ने कहा कि तुलसी साहित्य भारतीय समाज की आत्मा को स्पंदित करता है। वहीं सिंचाई विभाग के एसडीओ शंकर गेंदले ने कहा कि तुलसी साहित्य हमारी सांस्कृतिक चेतना की आधारशिला है और तुलसी के आदर्शों को केवल समारोहों तक सीमित न रखकर जीवन में उतारना चाहिए।
मानस विमर्श में तुलसी साहित्य की प्रासंगिकता पर मंथन
समारोह में आयोजित मानस विमर्श में तुलसी साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर विद्वानों ने विचार रखे। डॉ. सत्यनारायण तिवारी, डॉ. अंकुर शुक्ला सहित अन्य विद्वानों ने रामचरितमानस के जीवन-दर्शन, लोकमंगल, मर्यादा, भक्ति और वर्तमान सामाजिक संदर्भों पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए।
भक्ति संगीत और कवि सम्मेलन ने बांधा समां
विभिन्न भजन मंडलियों और कलाकारों की प्रस्तुतियों से मंदिर परिसर भक्तिरस से सराबोर हो गया। श्रीमती मयूरी खंडेलवाल, सुश्री मयंशी खंडेलवाल सहित कलाकारों ने भक्तिमय प्रस्तुतियां दीं। इसके बाद आयोजित विराट कवि सम्मेलन में विजय कल्याणी तिवारी, अमृतलाल पाठक, बुधराम यादव, शिवशरण श्रीवास्तव, अशोक शर्मा ‘अद्वितीय’, मयंक मणि दुबे, डॉ. राघवेन्द्र दुबे और दीपक दुबे ‘सागर’ सहित अनेक कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर श्रोताओं को अभिभूत किया।
इस अवसर पर साहित्य, समाज, संस्कृति और मानस परंपरा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली प्रतिभाओं का सम्मान भी किया गया। संयोजक विष्णु कुमार तिवारी ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह आयोजन तुलसी साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास है। सह-संयोजक दीपक दुबे ‘सागर’ ने भी समारोह को संबोधित किया।
भक्तिमय वातावरण में समारोह का समापन हुआ। आयोजन ने यह संदेश दिया कि जहां मानस का मर्म है, वहां संस्कार हैं, जहां राम का आदर्श है, वहां मर्यादा है और जहां तुलसी की वाणी है, वहां भारतीय संस्कृति की अमर चेतना है।
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- अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
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