जगदलपुर, 16 अक्टूबर 2020 वायरलेस न्यूज अरुण पाढ़ी/ काछनगुड़ी मंदिर में काछन देवी ने शुक्रवार की शाम को रिमझिम बारिश के बीच बेल के कांटों के झुलते हुए बस्तर राजपरिवार के सदस्यों को फूल और प्रसाद देकर बस्तर दशहरा के आयोजन की अनुमति दी। आम तौर पर 75 दिनों तक चलने वाले, लेकिन इस साल अधिमास होने के कारण 104 दिन तक चलने वाले बस्तर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा पर्व को मनाने के लिए बेल के कांटों में झूलती काछन देवी अनुराधा ने दशहरा मनाने की अनुमति और आशीर्वाद दिया।
इसके साथ ही राजपरिवार के सदस्य शहर के बीचोंबीच स्थित गोलबाजार में रैला देवी से भी आर्शीवाद लेने पहुंचे जहां रैला देवी ने भी निर्विध्न दशहरा हेतु आर्शीवाद प्रदान किया। इसके साथ ही दंतेवाड़ा की मॉ दंतेश्वरी देवी तथा अंचल के अन्य देवी-देवताओं को निमत्रंण पत्र भेजा गया।
भंगाराम चैक स्थित काछनगुड़ी में काछनदेवी से बस्तर दशहरा के आयोजन की अनुमति मांगने के लिए सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष श्री दीपक बैज, सहित महाराजा कमलचंद्र भंजदेव तथा पुजारी व राजगुरू, कलेक्टर श्री रजत बंसल सहित बस्तर दशहरा समिति के सदस्य और विभिन्न समाज के प्रतिनिधि सम्मिलित थे। मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्म काछन पूजा आज अश्विन अमावस्या को भंगाराम चैक स्थित काछनगुड़ी में पूरी हुई, जहां नौ दिनों से उपवास कर रही नाबालिग बालिका अनुराधा को देवी की सवारी आने पर उसे बेल के कांटों से तैयार झूले पर झुलाया गया। काछन देवी ने राज परिवार के सदस्यों सहित भक्तों को प्रसाद और आशीर्वाद देकर पर्व मनाने की अनुमति दी।
बस्तर में निवास करने वाली विभिन्न समुदायों के सहयोग से आयोजित विश्व प्रसिद्ध यह दशहरा पर्व जातीय समभाव का अनुपम उदाहरण है। इसमें सभी जाति के लोगों को जोडकर इनकी सहभागिता निश्चित की गई है। इसीलिए यह जन-जन का पर्व कहलाता रहा है। इस महापर्व के लिए काछनदेवी के रूप में पनका जाति की बालिका की अनुमति सामाजिक एकता की भावना और नारी सम्मान का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस बार लगातार पांचवें साल बस्तर दशहरा निर्विघ्न और सफलतापूर्वक संपन्न होने का आशीर्वाद ग्राम मारेंगा की 11 वर्षीय अनुराधा ने दिया।अनुराधा के परिजनों ने बताया कि बरसों से उनके परिवार की ही कुंवारी कन्या पर काछन देवी की सवारी आ रही है। अनुराधा के पूर्व उसकी मौसी और मां भी काछन देवी के रूप में कांटों के झूले पर बैठ चुके हैं। परंपरा के अनुसार बस्तर राजपरिवार को काछन देवी, प्रसाद तथा फूल देकर दशहरा मनाने की अनुमति देती है, इसके बाद दशहरा के अन्य प्रमुख रस्म संपादित किये जाते हैं। अनुराधा ने बताया कि उसे कांटों के झूलों पर बैठने पर डर नहीं लगता, मां दंतेश्वरी का आर्शीवाद उसके साथ है। व्रत रखने से उसे नई उर्जा मिलती है। बस्तर अंचल में काछिन देवी, रण की देवी कहलाती है। काछिन गादी का अर्थ होता है, काछिन की देवी को गादी अर्थात् गद्दी या आसन प्रदान करना, जो कांटों की होती है। काले रंग के कपड़े पहनकर कांटेदार झूले की गद्दी पर आसन्न होकर जीवन में कंटकजयी होने का सीने में हाथ रखकर सांकेतिक संदेश देती हैं। काछिन देवी बस्तर दशहरा में प्रतिवर्ष निर्विघ्न आयोजन हेतु स्वीकृति और आशीर्वाद प्रदान किया करती हैं। काछिन देवी से स्वीकृति सूचक प्रसाद मिलने के पश्चात् बस्तर का दशहरा पर्व धूमधाम से प्रारंभ हो जाता है। मान्यता के अनुसार काछिन देवी पशुधन और अन्न-धन की रक्षा करती है।
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- अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
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