*दंडकारण्य में श्रीराम का वनवास कई मायनों में महत्वपूर्ण*
*- डॉ शाहिद अली*

प्राचीन भारत में दंडकारण्य वनों से आच्छादित एक वृहद भौगोलिक स्थिति का क्षेत्र रहा है। दण्डक और अरण्य दो शब्दों से मिलकर यह दण्डक वन कहलाता है यानी दंड देने वाला जंगल।‌ लोक चर्चा में कहा जाता है कि घने जंगलों और खूंखार जानवरों से घिरा यह क्षेत्र जीवन के कठोर तप , संघर्ष और यातना का स्थल रहा है। विंध्याचल से लेकर गोदावरी तक दंडकारण्य के सुप्रसिद्ध वनों का फैला हुआ परिदृश्य हमेशा से आकर्षण एवं कौतूहल का विषय रहा है। इसका ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व खोज एवं अध्ययन की दृष्टि से विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचता रहा है। वनवास के समय भगवान श्री रामचन्द्र ने यहां एक लंबा समय गुजारा है।
दंडकारण्य पूर्वी मध्य भारत का भौगोलिक क्षेत्र है। लगभग 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफ़ल में फैले इसके पश्चिम में अबूझमाड़ की पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट का विस्तार है। दंडकारण्य के विशाल अरण्य में छत्तीसगढ़, तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे पांच बड़े राज्यों का परिक्षेत्र शामिल है। सदियों से दंडकारण्य रहस्यों की अबूझ पहेली भी रहा है इसलिए यहां अबूझमाड़ भी है। लंबे समय से अनेकों इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और मानवविज्ञानियों का अध्ययन दंडकारण्य को समझने में बदस्तूर जारी है। एक किंवदंती के अनुसार दंडकारण्य क्षेत्र को मांडव्य नामक ऋषि ने श्राप दिया था, जिन्हें एक ऐसे अपराध के लिए अनुचित दंड दिया गया था जो उन्होंने किया ही नहीं था। इस श्राप के कारण यह भूमि राक्षसों और दुष्ट आत्माओं से शापित हो गई, जिससे यह मनुष्यों के लिए एक दुर्गम स्थान बन गया। इसलिए यह स्थान और भी रहस्यमय माना जाता है।

पुरातात्विक अध्ययनों से पता चलता है कि दंडकारण्य प्रागैतिहासिक काल से ही बसा हुआ है। नवपाषाण काल के पत्थर के औजार, मिट्टी के बर्तन और अन्य कलाकृतियां आज भी इसके गवाह हैं। घने जंगलों में दंडकारण्य के विशाल क्षेत्र को समझना बहुत कठिन है। दंडकारण्य की एक पहचान उसकी समृद्ध जैव विविधता है। इस क्षेत्र के जंगल विविध प्रकार की वनस्पतियों और जीवों का घर है। बहुमूल्य औषधीय पौधों का उपयोग आदिवासी समुदाय सदियों से करते आ रहे हैं। आदिवासियों का जंगलों से गहरा नाता है और इनकी पारंपरिक जीवन शैली प्राकृतिक संसाधनों से गहराई से जुड़ी है। आदिवासी हस्तशिल्प और संस्कृति की अद्भुत मिसाल यहां देखी जा सकती है। ऐसी विविधताओं से समृद्ध दंडकारण्य का आध्यात्मिक महत्व तब और बढ़ जाता है जब राम वन गमन पथ की चर्चा होती है। छत्तीसगढ़ का यह वैभवशाली इतिहास है। रामायण के अनुसार दंडकारण्य में श्रीराम के लोकोद्धार संबंधी कार्यों की नींव पड़ी। रामायण में दंडकारण्य का उल्लेख है। महाकाव्य रामायण में दंडकारण्य का उल्लेख उस स्थान के रूप में मिलता है जहां भगवान श्रीराम ने अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ चौदह साल का वनवास बिताया। यहां कई ऐसे स्थल हैं जो रामायण की घटनाओं से जुड़े हुए हैं और धार्मिक आस्था के केंद्र हैं। दंडकारण्य में श्रीराम का वनवास कई मायनों में महत्वपूर्ण था जब उन्होंने ऋषि मुनियों की रक्षा के लिए की राक्षसों का वध किया जिनमें खर और दूषण जैसे राक्षस मारे गए थे। उन्होंने इस क्षेत्र को राक्षसों से मुक्त कराकर एक सुरक्षित स्थान बनाया।‌ दंडकारण्य में एक महत्वपूर्ण स्थान है पंचवटी, जहां भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ निवास किया था। पंचवटी में ही रावण ने सीता का हरण किया था जो रामायण का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। दंडकारण्य में भगवान राम की उपस्थिति का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। हिंदू धर्म के लिए यह क्षेत्र आस्था और दर्शन का प्रमुख स्थान है। ऐसे अनेक स्थल दंडकारण्य में हैं जो भगवान श्रीराम की कहानी से जुड़े हुए हैं, इसलिए यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
दंडकारण्य में भगवान राम की उपस्थिति रामायण के पन्नों में दर्ज है। भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान दंडकारण्य में कई महत्वपूर्ण घटनाओं का सामना किया इसलिए यह क्षेत्र हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थल है।
दंडकारण्य में आदिवासी संस्कृति एक समृद्ध और विविध धरोहर है, जो इस क्षेत्र की पहचान को दर्शाती है। दंडकारण्य में कई आदिवासी समुदाय निवास करते हैं, जिनकी अपनी अनोखी संस्कृति, परंपराएं, और जीवनशैली है। इन समुदायों में गोंड समुदाय दंडकारण्य में एक प्रमुख आदिवासी समुदाय है, जो अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है। गोंड समुदाय के लोग अपनी कला, संगीत और नृत्य के लिए प्रसिद्ध हैं। बैगा समुदाय भी दंडकारण्य में निवास करता है और अपनी अनोखी संस्कृति और जीवनशैली के लिए जाना जाता है। बैगा समुदाय के लोग प्रकृति की पूजा करते हैं और अपनी परंपराओं को बहुत महत्व देते हैं। माड़िया समुदाय दंडकारण्य में निवास करने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण आदिवासी समुदाय है। माड़िया समुदाय के लोग अपनी कला और शिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं और अपनी परंपराओं को सहेजकर रखते हैं।
दंडकारण्य के आदिवासी समुदाय अपनी समृद्ध लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाने जाते हैं, जिनमें राम की पवित्र स्मृतियों का उल्लेख मिलता है। आदिवासी समुदायों में नृत्य और संगीत का बहुत महत्व है। ये समुदाय अपने त्योहारों और समारोहों में पारंपरिक नृत्य और संगीत का प्रदर्शन करते हैं। विभिन्न त्योहारों और समारोहों का आयोजन करते हैं, जो उनकी संस्कृति और परंपराओं का हिस्सा हैं। ये त्योहार प्रकृति की पूजा और समुदाय के बंधन को मजबूत करने के लिए मनाए जाते है।आदिवासी समुदाय अपनी कला और शिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं। ये समुदाय विभिन्न प्रकार की हस्तशिल्प वस्तुओं का निर्माण करते हैं, जो उनकी संस्कृति और परंपराओं को दर्शाती है जिनमें राम के दर्शन मिलते हैं। दंडकारण्य के आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक जीवनशैली के लिए जाते हैं।
दंडकारण्य के सबसे बड़े भू-भाग वाले बस्तर में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां राम और लक्ष्मण आदिवासी समुदायों के जीवन व्यवहार में उपस्थित हैं। तभी लाला जगदलपुरी लिखते हैं कि बस्तर अंचल की आदिम प्रजातियों के एक पक्ष में श्रीराम के स्मृति चिन्ह हैं। हल्बी भतरी लोक साहित्य में कहीं कहीं प्रसंगवश श्रीराम संदर्भित हैं, जिसमें कहते हैं, करेया डेरी / करेया पाटी / राम – लैखन र घर / राम लैखन पकाई देला, करेया छालीरफर । ये एक पहेली है। पहेली में यह चित्र उभरता है कि आसमान पर काले काले घटाटोप बादल छाए हुए हैं, आंधी पानी का जोर है, ओले बरस रहे हैं। ऐसा कहते हैं कि इन ओलों को ग्रामवासी राम लैखन द्वारा गिराए गए प्रसाद समझकर ग्रहण करते और झेलते भी हैं। राम लैखन ने काले-काले छिलकों वाले फूलों के छिलके उतार उतार कर उनके सफेद खाद्यांश फैंके हैं। इतने दयालु हैं वे। भतरी लोक साहित्य के इस बिंदु में राम के प्रति अगाध श्रद्धा का पहलू अद्भुत है। हल्बी भतरी लोक साहित्य में ऐसे अनेकों प्रसंग मिल सकते हैं जिनमें राम चर्चा मौजूद है।
दंडकारण्य का दर्शन और उसका सौन्दर्य बोध बिना राम चर्चा के अधूरा है। कहा जाए तो दंडकारण्य की भूमि, वन और आदिवासी का सम्मिलन ही वास्तव में श्रीराम की उपस्थिति और उसका दर्शन है । दंडकारण्य के आदिवासी समुदायों की संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण एवं संवर्धन इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को बनाए रखने के लिए जरूरी है।

( लेखक मीडिया शिक्षाविद् है)

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Amit Mishra - Editor in Chief
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