बिलासपुर/ जबलपुर (वायरलेस न्यूज) पत्रकार और नाट्य निर्देशक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले अरुण पाण्डेय का 21 सितंबर को शाम सवा पांच बजे 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
अरुण पाण्डेय ने जबलपुर के हितवाद (ज्ञानयुग प्रभात), नवीन दुनिया, नव भास्कर, खबरसत्ता, स्वतंत्र मत, जयलोक और रायपुर व बिलासपुर में दैनिक भास्कर में कार्य किया था। उन्हें अखबार के प्रथम पृष्ठ का जादूगर माना जाता था। जिस समय कम्प्यूटर व उसके साफ्टवेयर प्रणाली उतनी विकसित नहीं हुई थी, तब अरुण पाण्डेय अखबार के प्रथम पृष्ठ का ऐसा ले-आउट तैयार करते थे जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी।
वे पत्रकार, रंगकर्मी, चित्रकार, कथाकार, कवि व बेहतर टेक्नीशियन थे। वे बेहद पढ़ाकू थे। उन्होंने आठवें दशक के अंत में अलखनंदन के भोपाल में रंगमंडल में जाने के बाद विवेचना की कमान संभाली और नए-नए नाटकों का मंचन करने की जिम्मेदारी संभाली। अरुण पाण्डेय एक उत्कृष्ट संगठक थे इसलिए उन्होंने विवेचना को एक सूत्र में बांधकर नाटकों के मंचन से पूरे देश में स्वयं को और विवेचना को प्रतिष्ठित कर दिया।
अरुण पाण्डेय ने हरिशंकर परसाई के व्यंग्य को नाटकों के माध्यम से जन जन तक पहुंचाया। ईसुरी के माध्यम से अरुण पाण्डेय ने बुंदेली को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। नाट्य निर्देशक के रूप में अरुण पाण्डेय की सबसे बड़ी विशेषता उनके निर्देशित नाटकों की विविधता थी। वर्ष 1995 अरुण पाण्डेय के लिए महत्वपूर्ण था जब उन्होंने उदयप्रकाश की रचना और अंत में प्रार्थना पर नाट्य मंचन किया था।
अरुण पाण्डेय स्वयं में एक संस्था की तरह थे। उनके सानिध्य में सैकड़ों रंगकर्मी उभरे और इन रंगकर्मियों ने अपने को कला की दुनिया में स्थापित किया। अरुण पाण्डेय मूलत: गंगा के किनारे बनारस के थे लेकिन सातवें दशक में उन्होंने नर्मदा के तट पर बसे जबलपुर से गहरा नाता जोड़ लिया था और यहीं के होकर रह गए। उनके रंगकर्म अवदान के लिए वर्ष 2014-15 में मध्यप्रदेश का शिखर पुरस्कार देने का निर्णय चयन समिति ने लिया लेकिन यह सम्मान घोषित नहीं किया गया। अरुण पाण्डेय जानने पहचानने वालों के लिए ‘दादा’ थे। वे हम लोगों के लिए हर समय ‘दादा’ ही रहेंगे।
साभार “जबलपुर सफरनामा” Jabalpur Safarnama
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