जलवायु संकट: क्या हम 2047 में जश्न मना पायेंगे?

( वायरलेस न्यूज) प्रसिद्ध जलवायु वैज्ञानिक जेम्स हैनसन चेतावनी देते रहे हैं कि हम जलवायु संकट की गंभीरता को कम करके आंक रहे हैं। अभी हाल में पॉट्सडैम विश्वविद्यालय-जलवायु प्रभाव अनुसंधान संस्थान, जर्मनी ने बताया है कि 1970–2015 के बीच पृथ्वी का तापमान लगभग 0.2 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक बढ़ रहा था, जबकि 2015 के बाद यह बढ़कर लगभग 0.35 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक हो गया है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के अनुसार 2027 से 2030 के बीच औद्योगिक युग चालू होने के औसत से लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस के बराबर तापमान बढ़ जाएगा। आईपीसीसी के अनुसार हम जिस गति से उत्सर्जन कर रहे हैं उस गति को कम न करने पर 2040 से 2045 के मध्य यह 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। सदी के मध्य तक तापमान 2.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। पेरिस समझौते के बाद कोरोना काल छोड़ दें तो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने में हम असफल हुए हैं। यह तापमान अब 1.5 डिग्री सेल्सियस के बराबर पहुचं रहा है।
तो क्या यह तापमान कम किया जा सकता है? उत्तर है नहीं। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में एक प्रकार की जड़ता होती है। इसका अर्थ यह है कि यदि आज से ही ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अचानक रोक दिया जाए, तब भी पृथ्वी का तापमान सदियों तक बढ़ता रहेगा। इसका प्रमुख कारण यह है कि पृथ्वी के महासागरों ने अब तक हमारे द्वारा किए गए कार्बन डाइऑक्साइड से निकली ऊष्मा का लगभग 90 प्रतिशत भाग अपने भीतर संचित कर रखा है, जो धीरे-धीरे वातावरण को प्रभावित करता रहेगा। इसके अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड स्वयं भी वातावरण में सैकड़ों वर्षों तक मौजूद रहता है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि कैसी होगी 2030 और 2040 के बाद की दुनिया? पॉट्सडैम विश्वविद्यालय के निदेशक तथा आईपीसीसी आकलन रिपोर्ट के प्रमुख लेखकों में से एक प्रोफेसर जोहान रॉकस्ट्रॉम ने चेतावनी दी है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि कोई सुरक्षित स्तर नहीं है। 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान बढ़ने पर आर्थिक और सामाजिक नुकसान तेजी से बढ़ने लगेगा, और ऐसे कई प्रभाव सामने आ सकते हैं जिनके बारे में हमने सोचा भी नहीं हो। 1.5 डिग्री सेल्सियस पर फसलों की पैदावार बनाए रखना, बीमारियों के फैलाव को नियंत्रित करना तथा हीट वेव, सूखा और अन्य चरम मौसमीय घटनाओं से निपटना आसान नहीं होगा। यदि तापमान 2 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुँचता है, तो दुनिया भर में करोड़ों लोगों के लिए असहनीय कष्ट और आर्थिक कठिनाई पैदा हो सकती है। उसके बाद तापमान में केवल 0.5 डिग्री सेल्सियस डिग्री सेल्सियस की अतिरिक्त वृद्धि हमें एक कठिन और अज्ञात भविष्य की ओर धकेल सकती है। एक समस्या और है: वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक अस्थिर होता जा रहा है। यदि यह अस्थिरता बढ़ी तो हमें नहीं मालूम फसलों का क्या होगा।
1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा पर घातक हीट वेव, बाढ़, भारी बारिश के समय शहरों में जलभराव, जंगलों में आग, ग्लेशियर लेक फटना, सूखा और आंधी-तूफान जैसी चरम मौसम घटनाएँ अधिक बार और अधिक तीव्र रूप में होने लगेंगी। फसलों की पैदावार प्रभावित होगी, स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ेगा और बीमारियों का फैलाव बढ़ेगा जिनमें मच्छरों से, पानी से, भोजन से फैलने वाली बीमारियाँ बढ़ेंगी। पीने के पानी की कमी आम बात बन जाएगी। समाज में तनाव बढ़ेगा, बड़े पैमाने पर पलायन होगा और अस्थिरता बढ़ेगी। 2 डिग्री सेल्सियस पर बच्चे बाहर जाकर खेल नहीं पाएँगे। तब आमजन का केवल जीवित रहना ही मुख्य जॉब बचेगा।
विज्ञान की इतनी चेतावनियों के बावजूद भी हम जलवायु परिवर्तन को नकारते हुए जीडीपी, विकास और 2047 में जश्न मनाने की तैयारी में जुट गए हैं। जनता इस संकट को नहीं समझती। ऐसे में आम जनता को इस संकट के बारे में कैसे समझाया जाए? क्या नेता समझाएँगे? जिस दिन नेताओं ने स्वीकार लिया कि हां जलवायु संकट है और आपसे छुपाया गया उस रोज से जनता उनकी नेतागिरी बंद करवा देगी। कुछ काम नौकरशाह कर सकते हैं जो नेताओं को जलवायु संकट के विरुद्ध कार्य करने से मना कर सकते हैं, जो अनावश्यक विकास किया जा रहा है उस धन को जलवायु-अनुकूल कार्यों में लगा सकते हैं, पर 24 घंटे वातानुकूल वातावरण में रहने वाले अधिकतर नौकरशाह भी इस संकट को नकारते हैं या नहीं समझते।
जो भी हो हमें तुरंत और व्यावहारिक कदम उठाने की आवश्यकता है। हमें जनता को सच बताना पड़ेगा। गाँवों और शहरों में सौर ऊर्जा से चलने वाले वातानुकूलित सामुदायिक केंद्र बनाए जाने चाहिए जहाँ भीषण गर्मी के समय लोग सुरक्षित शरण ले सकें। प्रत्येक प्राथमिक स्वास्थ्य, आँगनबाड़ी केंद्र में स्वास्थ्य सुविधाएँ इतनी मजबूत होनी चाहिए कि वहाँ हीट स्ट्रोक और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अन्य बीमारियों का उपचार किया जा सके। शहरों और गाँवों में जहाँ भी सरकारी भूमि उपलब्ध हो, वहाँ शहरी वन विकसित किए जाने चाहिए ताकि स्थानीय तापमान कम रहे। पंचायत स्तर पर प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए। इसके साथ-साथ हीट वेव, जल संरक्षण, बिजली गिरने की घटनाएं, फसल विफलता और जलवायु जोखिमों इत्यादि के बारे में व्यापक जनजागरूकता भी आवश्यक है। ऐसे कदम आने वाले दशकों में लोगों को होने वाली कठिनाइयों को काफी हद तक कम कर सकते हैं। जलवायु अनुकूलन तैयारी में आज खर्च होगा, लेकिन अनदेखी करने पर भविष्य में इसकी कीमत मानव पीड़ा, आर्थिक नुकसान और सामाजिक अस्थिरता के रूप में कहीं अधिक चुकानी पड़ेगी।
नितिन सिंघवी
पर्यावरण प्रेमी