*डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा: छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी के लिए समर्पित पुरोधा* डॉ सुधीर शर्मा (वरिष्ठ साहित्यकार)
(वायरलेस न्यूज छत्तीसगढ़)
डॉ पालेश्वर प्रसाद शर्मा छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी के लिए मर मिटने वाले लेखक थे। वे छत्तीसगढ़ी गद्य को लालित्य देने वाले अनुपम गद्यकार थे। एक ओर जहां उनके पास हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसी गहन समीक्षा दृष्टि थी, जो भाषा और साहित्य का समन्वय करती थी तो दूसरी ओर निबंधों में लालित्य का अमृत रस प्रवाह की विलक्षण प्रतिभा थी। वे इतिहास, भाषा , साहित्य, समीक्षा और लोक के गहन अध्येता थे। अनुशासन प्रियता के कारण वे बाहर से कठोर लेकिन भीतर से सरल मन के धनी थे। अब उनकी तीन पुस्तकें सर्वप्रिय प्रकाशन दिल्ली -रायपुर से नये अवतार में आ रही हैं। इन पर विमर्श के नये बिंदु उभर कर आएंगे।छत्तीसगढ़ की माटी, उसकी लोक-संस्कृति और अस्मिता के इतिहास में डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन इस अंचल की भाषा और संस्कृति को शास्त्रीय गरिमा दिलाने में समर्पित कर दिया। डॉ. देवधर महंत के संपादन में प्रकाशित कृति ‘कीर्तिशेष डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा’ केवल एक व्यक्ति का संस्मरण नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी पुनर्जागरण की एक गाथा है। डॉ. शर्मा एक ऐसे विराट व्यक्तित्व थे, जिनमें कृषि और ऋषि संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलता था। उन्होंने उस दौर में छत्तीसगढ़ी की मशाल जलाई, जब इसे केवल ‘किसानों की भाषा’ समझा जाता था।
डॉ. शर्मा के शोध प्रबंध ‘छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन की शब्दावली’ को विद्वानों ने अपने विषय का सर्वश्रेष्ठ कार्य माना है। यह शोध केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि विलुप्त हो रहे नौ हजार ठेठ छत्तीसगढ़ी शब्दों का पुनरुद्धार था, जिसने छत्तीसगढ़ी के शब्द-भंडार को एक नई वैज्ञानिक पहचान दी। उनके भीतर अपनी भाषा के प्रति ऐसा अगाध प्रेम और स्वाभिमान था कि जब एक बार आकाशवाणी नागपुर के कर्मचारी ने चुनौती दी कि ‘छत्तीसगढ़ी में कहानी नहीं लिखी जा सकती’, तो उन्होंने रातों-रात ‘नाव के नेह म’ जैसी कालजयी कहानी रचकर अपनी रचनात्मक शक्ति का लोहा मनवा दिया।
इतिहास और परंपरा के व्याख्याता
उनकी कालजयी कृति ‘छत्तीसगढ़ का इतिहास एवं परंपरा’ राजा-महाराजाओं के युद्धों का विवरण मात्र नहीं है, बल्कि यह यहाँ के जन-मानस की आत्मा का प्रामाणिक दस्तावेज है। इस ग्रंथ में उन्होंने छत्तीसगढ़ को महज एक भू-खंड न मानकर उसे मानवता की जन्मभूमि और ऋषियों की तपोभूमि के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
उन्होंने ‘चिंत’ (पीढ़ी पूजा) जैसी विशिष्ट परंपरा को पहली बार लिपिबद्ध किया।
उन्होंने सिरपुर, मल्हार और जांजगीर के मंदिरों की तुलना अजंता और खजुराहो जैसी वैश्विक शैलियों से कर छत्तीसगढ़ के शिल्प को राष्ट्रीय फलक पर रखा।
डॉ. शर्मा ने सतनामी समाज को छत्तीसगढ़ी का ‘अनजाना प्रचारक’ माना और स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ का गाँव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का साक्षात् उदाहरण है।
गुड़ी के गोठ: यथार्थ और सरोकार का संगम
साहित्यिक दृष्टि से डॉ. शर्मा की बहुआयामी प्रतिभा का सजीव चित्रण उनकी कृति ‘गुड़ी के गोठ’ में मिलता है। यह पुस्तक छत्तीसगढ़ की सोंधी महक और जीवन के कड़वे यथार्थ का अद्भुत मेल है।
‘गुड़ी के गोठ’ जैसा धारावाहिक स्तंभ 150 सप्ताह तक अनवरत चला, जिसने छत्तीसगढ़ी साहित्य का एक विशाल पाठक वर्ग तैयार किया।
इसमें जहाँ एक ओर लोकपर्वों का उल्लास है, वहीं दूसरी ओर परदेश में युवतियों के शोषण, दहेज की भूख और बाजारवाद जैसी विसंगतियों पर तीखा प्रहार भी है। राजनीतिक व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए वे लिखते हैं— “चुनाव में अंधा पांच साल के लिए लाठी खो देता है।”
डॉ. शर्मा केवल किताबी ज्ञान के व्याख्याता नहीं थे। एक शिक्षक के रूप में वे कक्षा में गुनगुनाते हुए प्रवेश करते थे और पढ़ाते समय वेद-वेदांग से लेकर फ्रायड के मनोविज्ञान तक को लोक-जीवन के साथ एकाकार कर देते थे। वे एक ‘गृहस्थ संत’ थे, जिनके पत्रों को उनके परिजनों ने ‘प्रेरणा की पाती’ माना है। उनके ललित निबंधों का संग्रह ‘सुरुज साखी हे’ हिंदी के श्रेष्ठ निबंधों के समकक्ष खड़ा होता है।
डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा का व्यक्तित्व और उनकी कृतियाँ यह सिद्ध करती हैं कि कैसे एक व्यक्ति अपनी कलम और निष्ठा के बल पर पूरी क्षेत्रीय भाषा की नियति बदल सकता है। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि अपनी मातृभाषा का त्याग करना अपनी पहचान खोने जैसा है।
आज जब हम छत्तीसगढ़ी गौरव की बात करते हैं, तो डॉ. शर्मा द्वारा रचित ‘छत्तीसगढ़ी-हिन्दी शब्दकोश’ और ‘छत्तीसगढ़ का इतिहास और परंपरा ‘ जैसे ग्रंथ हमारे लिए आधार स्तंभ हैं। वे केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी अस्मिता के पुनर्जागरण के पुरोधा थे, जिनकी स्मृतियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव पाथेय बनी रहेंगी। – *डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़*
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