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अत्यधिक गर्मी से छत्तीसगढ़ तप रहा है, अब हर खाली शासकीय भूमि पर “शहरी वन” विकसित करने की जरूरत सिंघवी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सवाल उठाया — क्या हम भविष्य में अपने अस्तित्व को लेकर थोड़े भी चिंतित हैं?

On: May 26, 2026 9:39 AM

अत्यधिक गर्मी से छत्तीसगढ़ तप रहा है, अब हर खाली शासकीय भूमि पर “शहरी वन” विकसित करने की जरूरत।

सिंघवी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सवाल उठाया — क्या हम भविष्य में अपने अस्तित्व को लेकर थोड़े भी चिंतित हैं?

रायपुर, वायरलेस न्यूज 26 मई / पूरा छत्तीसगढ़ इन दिनों ऐतिहासिक भीषण गर्मी से तप रहा है। इनमें रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और बिलासपुर प्रमुख हैं। आम जनता, मजदूर, रिक्शा चालक, गिग वर्कर्स, किसान, बुजुर्ग और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं। लगातार बढ़ती गर्मी, उमस और हीटवेव अब सामान्य होती जा रही हैं। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले वर्षों में जलवायु संकट और भी खतरनाक रूप ले सकता है। कई वैज्ञानिकों के अनुसार 2027 अब तक का सबसे गर्म वर्ष हो सकता है।

खाली शासकीय जमीनों पर आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं का विरोध:

प्रकाशित खबरों के अनुसार रायपुर, दुर्ग और राजनांदगांव की खाली शासकीय जमीनों पर आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाएँ विकसित करने के प्रस्ताव मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति को भेजे गए हैं। इनमें रायपुर के शांति नगर और बीटीआई कॉलोनी की भूमि भी शामिल है। सिंघवी ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर इन योजनाओं का विरोध किया है। उन्होंने मांग की है कि बढ़ते “अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव” को देखते हुए हर उपलब्ध शासकीय भूमि पर, चाहे वह आधा हेक्टेयर ही क्यों न हो, शहरी वन विकसित किए जाएँ। इसके लिए उन्होंने पहले भी पत्र लिखा था, लेकिन दुर्भाग्य से आज भी शहरों में कंक्रीट बढ़ाने वाली योजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
कंक्रीट, लोहा और डामर की सड़कें दिन में गर्मी सोखती हैं और रात में धीरे-धीरे उसे छोड़ती हैं, जिससे शहरों में तापमान और बढ़ जाता है। इसी प्रभाव को “अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव” कहा जाता है।

कैसा होगा आने वाला समय:

सिंघवी ने पत्र में लिखा है कि जलवायु संकट अब इतना विकराल रूप ले रहा है कि आने वाले कुछ वर्षों में गर्मियों के दौरान बच्चों का बाहर खेलना तक मुश्किल हो सकता है। आने वाले दशक में गरीबों, किसानों, मजदूरों और आम लोगों का मुख्य जॉब सर्वाइवल यानी जीवित रहना बन सकता है।

वॉटर रिचार्ज के लिए तालाबों की रिटेनिंग वॉल्स और सड़कों के कंक्रीट पेवर हटाने की मांग:

पत्र में यह भी मांग की गई है कि शहरों और गांवों के तालाबों के चारों ओर अनावश्यक कंक्रीटीकरण और रिटेनिंग वॉल्स को हटाया जाए ताकि भूजल रिचार्ज फिर से बढ़ सके। इसी प्रकार कॉलोनियों में बनाए गए अनावश्यक कंक्रीट और पेवर शोल्डर्स को भी हटाकर मिट्टी या हरित सतह विकसित की जानी चाहिए, जिससे गर्मी कम हो और वर्षा जल जमीन में समा सके।
उन्होंने पत्र में लिखा है कि हमें यूरोप के कई देशों से सीख लेनी चाहिए, जहाँ शहरी गर्मी कम करने, भूजल रिचार्ज बढ़ाने और शहरों को जलवायु संकट के प्रति अधिक सक्षम बनाने के लिए अनावश्यक कंक्रीट सतहों, पक्के शोल्डर्स और यहाँ तक कि अनावश्यक डामर सड़कों को हटाने हेतु अभियान और प्रतिस्पर्धाएँ आयोजित की जा रही हैं।

पूछे गंभीर प्रश्न

सिंघवी ने लिखा कि यह समय की आवश्यकता है कि किसी भी विभाग में कोई भी निर्णय लेने से पहले हम जलवायु संकट और जैव-विविधता के पतन को ध्यान में रखें। हमें स्वयं से यह भी प्रश्न करना चाहिए: क्या हम जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में अपने अस्तित्व को लेकर थोड़ा भी चिंतित हैं, और क्या हम वास्तव में जलवायु संकट को लेकर गंभीर हैं? क्योंकि अब यह हमें तय करना है कि हम क्या चाहते हैं — विकास या अपने नागरिकों का अस्तित्व। यह समय केवल विकास की बात करने का नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की तैयारी करने का है।

Author Profile

Amit Mishra
Amit Mishra
अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
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