*संदर्भ अंजना ओम का विवादास्पद बयान
दो कौड़ी का मुहावरा : भारतीय मुद्रा इतिहास और लोकभाषा की एक रोचक यात्रा
— डॉ. सुधीर शर्मा*

(वायरलेस न्यूज छत्तीसगढ़)
हिंदी भाषा में प्रचलित मुहावरे केवल भाषिक अलंकरण नहीं हैं, बल्कि वे समाज, संस्कृति और इतिहास के जीवंत दस्तावेज भी होते हैं। ऐसे ही मुहावरों में एक अत्यंत लोकप्रिय मुहावरा है— “दो कौड़ी का”। आज जब हम किसी व्यक्ति, वस्तु या विचार को तुच्छ अथवा महत्वहीन बताने के लिए “दो कौड़ी का” कहते हैं, तब शायद ही हमें यह स्मरण रहता हो कि इस मुहावरे की जड़ें भारत की प्राचीन आर्थिक व्यवस्था और मुद्रा-इतिहास में गहराई तक पैठी हुई हैं। यह मुहावरा न केवल आर्थिक मूल्यांकन की एक ऐतिहासिक स्मृति है, बल्कि भारतीय लोकजीवन और भाषा के अंतर्संबंधों का भी एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
कौड़ी वास्तव में समुद्र में मिलने वाले एक छोटे शंख का नाम है। यह विशेष रूप से हिंद महासागर, मालदीव, श्रीलंका और पूर्वी अफ्रीका के तटीय क्षेत्रों में पाई जाती थी। आकार में छोटी, चमकदार और टिकाऊ होने के कारण कौड़ी प्राचीन समाजों में विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार की गई। मानव सभ्यता के आरंभिक दौर में जब धातु मुद्रा का विकास नहीं हुआ था और वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित थी, तब लेन-देन की सुविधा के लिए ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता महसूस की गई जिन्हें व्यापक रूप से स्वीकार किया जा सके। कौड़ी ने इस आवश्यकता की पूर्ति की।
भारतीय उपमहाद्वीप में कौड़ी का उपयोग अत्यंत प्राचीन काल से होता रहा है। इतिहासकारों के अनुसार, ईसा पूर्व की शताब्दियों से लेकर उन्नीसवीं सदी तक भारत के अनेक क्षेत्रों में कौड़ी छोटे मूल्य की मुद्रा के रूप में प्रचलित रही। बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम तथा मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में दैनिक लेन-देन के लिए कौड़ियों का उपयोग सामान्य बात थी। गाँवों के हाट-बाजारों में सब्जियाँ, अनाज, नमक और अन्य घरेलू वस्तुएँ कौड़ियों के बदले खरीदी-बेची जाती थीं।
कौड़ी के मुद्रा के रूप में लोकप्रिय होने के पीछे कई व्यावहारिक कारण थे। पहला, यह आसानी से पहचानी जा सकती थी। दूसरा, यह टिकाऊ थी और जल्दी नष्ट नहीं होती थी। तीसरा, इसे संग्रहित और परिवहन करना अपेक्षाकृत सरल था। चौथा, नकली कौड़ी बनाना कठिन था। इन गुणों के कारण कौड़ी ने लंबे समय तक छोटे लेन-देन की मुद्रा के रूप में अपना स्थान बनाए रखा।
मध्यकालीन भारत में कौड़ी और धातु मुद्रा दोनों समानांतर रूप से चलती थीं। बड़े व्यापारिक लेन-देन चाँदी या ताँबे के सिक्कों में होते थे, जबकि छोटे लेन-देन कौड़ियों में संपन्न किए जाते थे। विभिन्न क्षेत्रों में कौड़ी का मूल्य अलग-अलग था, किंतु सामान्यतः हजारों कौड़ियाँ मिलकर एक रुपया बनाती थीं। बंगाल में एक समय लगभग 5120 कौड़ियों के बराबर एक रुपया माना जाता था। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि एक या दो कौड़ियों का मूल्य कितना नगण्य रहा होगा।
यहीं से “दो कौड़ी का” मुहावरे की उत्पत्ति हुई। जब हजारों कौड़ियाँ मिलकर एक रुपया बनाती थीं, तब दो कौड़ियों का मूल्य लगभग नगण्य समझा जाता था। फलस्वरूप लोकभाषा में किसी महत्वहीन व्यक्ति, वस्तु या विचार के लिए “दो कौड़ी का” प्रयोग होने लगा। धीरे-धीरे यह अभिव्यक्ति मुहावरे का रूप धारण कर गई और आज तक हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में प्रचलित है।
भाषा में कौड़ी से जुड़े अनेक अन्य मुहावरे भी मिलते हैं। “कौड़ी-कौड़ी जोड़ना” का अर्थ है कठिन परिश्रम से धन संचय करना। “कौड़ी के मोल” का अर्थ अत्यंत सस्ता होना है। “कौड़ी-कौड़ी का हिसाब रखना” मितव्ययिता और आर्थिक सावधानी का प्रतीक है। ये सभी मुहावरे इस बात का प्रमाण हैं कि कौड़ी भारतीय समाज के आर्थिक जीवन में कितनी गहराई से जुड़ी हुई थी।
कौड़ी का महत्व केवल आर्थिक नहीं था। भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में भी इसका विशेष स्थान रहा है। आज भी दीपावली और लक्ष्मी पूजा में कौड़ियों का उपयोग शुभता और समृद्धि के प्रतीक के रूप में किया जाता है। कई जनजातीय समुदायों में कौड़ी से बने आभूषण पहनने की परंपरा जीवित है। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और पूर्वोत्तर भारत के अनेक लोकनृत्यों की वेशभूषा में कौड़ी आज भी दिखाई देती है। यह केवल एक प्राचीन मुद्रा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति का भी हिस्सा है।
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में जब औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत आधुनिक मुद्रा व्यवस्था विकसित हुई, तब कौड़ी का आर्थिक महत्व धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। धातु के मानकीकृत सिक्कों और बाद में कागजी मुद्रा के प्रसार ने कौड़ी को बाजार से बाहर कर दिया। किंतु समाज की सामूहिक स्मृति और भाषा में उसका अस्तित्व बना रहा। यही कारण है कि आज भी हम “दो कौड़ी का” कहकर किसी वस्तु या व्यक्ति के मूल्यांकन की एक ऐतिहासिक पद्धति को अनजाने में दोहराते हैं।
वस्तुतः “दो कौड़ी का” मुहावरा भारतीय समाज के आर्थिक इतिहास, सांस्कृतिक परंपरा और भाषाई विकास के त्रिवेणी-संगम का प्रतीक है। यह हमें बताता है कि भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, बल्कि वह इतिहास की चलती-फिरती स्मृति भी होती है। एक समय जो कौड़ी करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा थी, वही आज मुहावरे के रूप में हमारी भाषा में जीवित है। इस दृष्टि से “दो कौड़ी का” केवल एक मुहावरा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आर्थिक और सांस्कृतिक यात्रा का एक जीवंत अवशेष है।
*लेखक छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण भाषाविद हैं*