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आज़ादी की अमर गाथा और विभाजन की वह पीड़ा: इतिहास के पन्नों से वर्तमान का संकल्प

On: August 14, 2026 8:16 AM
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आज़ादी की अमर गाथा और विभाजन की वह पीड़ा: इतिहास के पन्नों से वर्तमान का संकल्प


(विशेष लेख- ग्रुप के साथी अतुल पटेल, राम द्विवेदी
एवं अन्य के सहयोग से टाइमलाइन के साथ)


बिलासपुर: (वायरलेस न्यूज छत्तीसगढ़)
भारत की स्वतंत्रता और वर्ष 1947 का विभाजन केवल इतिहास की दो तिथियां नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें एक ओर सदियों की गुलामी के बाद मिली स्वाधीनता का गर्व है, तो दूसरी ओर उस अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी की दास्तान है जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया था। भारत की स्वतंत्रता एक लंबे संघर्ष, त्याग, जन-आंदोलनों और असंख्य ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का परिणाम थी।1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन इसके साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन भी हुआ। विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। लाखों परिवार विस्थापित हुए, अनेक लोग बिछड़ गए और साम्प्रदायिक हिंसा में भारी जनहानि हुई।इसी पीड़ा, विस्थापन और मानवीय त्रासदी को याद करने के लिए भारत में हर वर्ष 14 अगस्त को “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” मनाया जाता है। भारत सरकार ने 2021 में यह दिवस मनाने की घोषणा की थी।हर वर्ष 14 अगस्त को मनाए जाने वाला ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ हमें इसी गौरवशाली अतीत और दर्दनाक यथार्थ दोनों से एक साथ रूबरू कराता है।

“स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आजादी का नाम नहीं है; यह शांति, समानता और आपसी भाईचारे के साथ जीने का पावन अधिकार है।”

​व्यापारिक कोठी से साम्राज्य तक: ईस्ट इंडिया कंपनी का सफर

​इतिहास के पन्नों को पलटने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत की स्वतंत्रता की यह लंबी यात्रा किसी एक दिन की घटना नहीं थी। इसकी पृष्ठभूमि 31 दिसंबर 1600 को उस समय तैयार हुई जब इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का अधिकार दिया।

​व्यापार के उद्देश्य से आई इस कंपनी ने धीरे-धीरे भारतीय राजनीति में दखल देना शुरू किया। वर्ष 1757 के प्लासी के युद्ध और 1764 के बक्सर के युद्ध ने इसके राजनीतिक प्रभुत्व की नींव मजबूत की। इसके बाद ब्रिटिश संसद द्वारा लाए गए विभिन्न कानूनों—जैसे 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट, 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट और समय-समय पर आए चार्टर एक्ट्स—ने धीरे-धीरे भारत की शासन व्यवस्था पर ब्रिटिश नियंत्रण को कस दिया।

​1857: स्वतंत्रता का प्रथम महासंग्राम

​ब्रिटिश हुकूमत के बढ़ते अत्याचार और शोषण के खिलाफ 10 मई 1857 को मेरठ से उठी चिंगारी ने एक विशाल विद्रोह का रूप ले लिया। यह संघर्ष दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी और बिहार तक फैल गया। मंगल पांडे, बहादुर शाह ज़फर, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, बेगम हजरत महल और कुंवर सिंह जैसे अमर सेनानियों ने अपने अदम्य साहस से अंग्रेजी सत्ता की चूलें हिला दीं। हालांकि इस विद्रोह को दबा दिया गया, लेकिन इसने भारत की राजनीतिक दिशा बदल दी। परिणामस्वरूप, 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया और भारत का प्रशासन सीधे तौर पर ब्रिटिश क्राउन (शाही नियंत्रण) के अधीन चला गया।

​राष्ट्रीय आंदोलन और जन-जन की भागीदारी

​1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद स्वतंत्रता की मांग ने एक संगठित और राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया।

​प्रमुख पड़ाव: 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधार, 1919 का मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (एवं जलियांवाला बाग हत्याकांड), 1920 का असहयोग आंदोलन, 1930 का दांडी मार्च और 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ इस संघर्ष के प्रमुख मील के पत्थर बने।

​क्रांतिकारी धारा: महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले जन-आंदोलनों के साथ-साथ भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फौज के योगदान ने देश की युवा शक्ति में नई ऊर्जा का संचार किया।

​1947: एक तरफ स्वाधीनता का उल्लास, दूसरी तरफ विभाजन का क्रूर सच

​द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदलती वैश्विक परिस्थितियों और भारत में तेज हुए स्वतंत्रता आंदोलन के बीच, 3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना की घोषणा हुई। इसके तहत ब्रिटिश भारत को विभाजित करने का निर्णय लिया गया।

​14 अगस्त 1947: पाकिस्तान का स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उदय हुआ, जबकि भारत के माथे पर विभाजन की वह लकीर खिंच गई जो आज भी इतिहास के सबसे बड़े मानवीय विस्थापन के रूप में दर्ज है।

​सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता वाले सीमा आयोग द्वारा खींची गई रेखा ने रातों-रात परिवारों को बांट दिया। पंजाब और बंगाल में हुई भयंकर सांप्रदायिक हिंसा, लाखों बेघर हुए शरणार्थियों का दर्द और अपनों से बिछड़ने की पीड़ा ने यह साबित कर दिया कि राजनीतिक स्वतंत्रता की कीमत कितनी भारी हो सकती है।

​15 अगस्त 1947: तमाम विभीषिका और आंसुओं के बीच, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले से तिरंगा फहराकर स्वतंत्र भारत के नए युग का सूत्रपात किया।

  • इतिहास से प्रेरणा और भविष्य का संकल्प*
    ​इतिहासकारों और विचारकों का मानना है कि विभाजन की विभीषिका को याद रखने का उद्देश्य किसी समुदाय विशेष के प्रति द्वेष फैलाना कतई नहीं है। इसका वास्तविक संदेश यह है कि घृणा, संप्रदायवाद और हिंसा की सबसे भारी कीमत हमेशा आम इंसानों को चुकानी पड़ती है।

1857 का संघर्ष हमें अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का साहस देता है, स्वतंत्रता आंदोलन हमें एकता और लोकतांत्रिक चेतना का पाठ पढ़ाता है, और विभाजन की त्रासदी हमें शांति, भाईचारे और मानव गरिमा की रक्षा करने का दृढ़ संकल्प दिलाता है।1857 का संघर्ष हमें साहस देता है।स्वतंत्रता आंदोलन हमें एकता और लोकतांत्रिक चेतना का संदेश देता है।विभाजन की त्रासदी हमें सिखाती है कि हिंसा और घृणा की सबसे बड़ी कीमत आम इंसान चुकाता है।स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आजादी नहीं, बल्कि शांति, एकता, समानता, लोकतंत्र और मानव गरिमा की रक्षा का संकल्प भी है।
🇮🇳 जय हिंद!
मुकेश अग्रवाल, बिलासपुर

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Amit Mishra
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अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

Amit Mishra

अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

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