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नक्सली हिंसा : शांति के लिए वार्ता कैसी ? – *डॉ शाहिद अली*

On: May 17, 2025 5:31 AM
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*नक्सली हिंसा : शांति के लिए वार्ता कैसी ?

– *डॉ शाहिद अली*

(वायरलेस न्यूज़ नेटवर्क)

छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा पर पूर्ण विराम लगने जा रहा है। बीजापुर के कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों में जवानों ने लगभग बीस दिनों का कठिन आपरेशन करके 31 नक्सलियों को मार गिराया। इतना ही नहीं तेलंगाना से सटे कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों में जवानों ने नक्सलियों के लगभग 250 से अधिक बंकरों का सफाया कर बड़ी संख्या में यूबीजीएल, इंसास, एसएलआर, एयरगन जैसे हथियार बरामद किए हैं। इस बड़े आपरेशन में जवानों ने 450 से अधिक आईईडी रिकवर कर डिफ्यूज किए हैं। कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों में बरसों से छिपे एरिया और डिविजनल कमेटी मेंबरों का एनकाउंटर हुआ है। जिन नक्सलियों को ढेर किया गया है उन पर लगभग दो करोड़ के इनाम घोषित थे। कर्रेगुट्टा की इन पहाड़ियों में सैंकड़ों की संख्या में नक्सलियों की मौजूदगी होती थी। छत्तीसगढ़ पुलिस, कोबरा बटालियन और सीआरपीएफ जवानों की संयुक्त टीम को मिली इस बड़ी सफलता और पुलिस द्वारा जारी किए गए वीडियो से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इन वीडियो की तस्वीरें बताती हैं कि नक्सलियों के इस गढ़ में सैंकड़ों टन राशन तथा हथियारों का एक बड़ा जखीरा मौजूद था जिससे बड़े पैमाने पर नक्सली हिंसा फैलाने की साज़िश को बल मिलता है।
कर्रेगुट्टा के सर्च आपरेशन में दिल्ली के एम्स में भर्ती घायल जवानों से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा ने मुलाकात की। इधर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कर्रेगुट्टा में जवानों से मुलाक़ात कर उनका हौंसला बढ़ाया तथा इस साहसिक सफलता के लिए बधाई दी।
इस मुलाकात में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संकल्प दोहराया, कि मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा से मुक्त हो जाएगा। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार और राज्य के गृह मंत्री विजय शर्मा लगातार बस्तर के घने जंगलों में नक्सलियों की गतिविधियों को समूल नष्ट करने की नीति पर काम कर रहे हैं। नक्सलियों से कहा गया है कि वे हथियार छोड़कर बिना किसी शर्त के मुख्य धारा में आएं। नक्सलवादी घटनाएं किसी भी रूप में स्वीकार नहीं है। बस्तर में नक्सली हिंसा के खिलाफ सरकार के आपरेशन ने पिछले एक साल में बड़ी कामयाबी हासिल की है। बताया जा रहा है कि इस एक साल में लगभग तीन सौ नक्सलियों का खात्मा हो चुका है और सैंकड़ों की संख्या में नक्सलियों ने समर्पण कर दिया है। बस्तर के घने जंगलों में जवानों ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है। घबराए माओवादी संगठन अब सरकार से बार-बार शांति वार्ता की अपील कर रहे हैं। लेकिन सरकार ने साफ कर दिया है कि अब कोई शांति वार्ता नहीं हो सकती है। नक्सली हथियार डालें और विकास की मुख्य धारा से जुड़ें। कहा जाता है कि माओवादी नेता शांति वार्ता के लिए पिछले महीनों में अब तक पांच चिट्ठियां सरकार को दे चुके हैं। लेकिन सरकार इससे इत्तेफाक नहीं रखती है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में पिछले कई वर्षों से जारी नक्सल हिंसा में सैंकड़ों जवानों, आदिवासियों और आम नागरिकों की जानें जा चुकी हैं। हिंसा अक्षम्य है। इसलिए सरकार यदि शांति वार्ता नहीं करना चाहती है तो इसमें गलत कुछ नहीं है क्योंकि शांति के लिए वार्ता की जरूरत क्यों है। शांति के लिए सियासत जरूरी नहीं है। हिंसा का त्याग ही शांति का पैगाम है। सवाल ये नहीं है कि सरकार शांति वार्ता के लिए आगे बढ़े। सवाल तो ये है कि क्या माओवाद और बंदूक का रिश्ता कभी खत्म होगा। छत्तीसगढ़ एक शांत प्रदेश है। जनजातीय बाहुल्य छत्तीसगढ़ के निवासी सीधे और भोले स्वभाव के होते हैं। छत्तीसगढ़ की जनजातियां प्रकृति के निकट हैं। ऐसे प्रदेश में माओवादी संगठनों की हिंसात्मक गतिविधियां से अशांति बनी हुई है। शांति के टापू में हिंसा को रोकना सरकार की पहली प्राथमिकता है। यह एक संयोग है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं आदिवासी समुदाय से आते हैं। आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ की संवेदनाओं और भावनाओं को उनसे बेहतर कौन समझ सकता है। इसलिए माओवादी संगठनों और उनके पट्टी पर बैठने वालों को शांति वार्ता का भ्रमजाल दिखाना बंद कर देना चाहिए। शांति का पथ कठिन नहीं है, चलकर देखिए, सरकार ने कब रोका है।

( *लेखक सुप्रसिद्ध मीडिया शिक्षाविद् हैं )*
drshahidaliktujm@gmail.com
16/05/2025

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Amit Mishra
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अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

Amit Mishra

अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

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