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8 साल की कानूनी लड़ाई के बाद किसान को बड़ी राहत: हाईकोर्ट ने एनएचएआई को 72 डिसमिल भूमि का अधिग्रहण कर मुआवजा देने का निर्देश

On: August 31, 2026 4:39 PM

8 साल की कानूनी लड़ाई के बाद किसान को बड़ी राहत: हाईकोर्ट ने एनएचएआई को 72 डिसमिल भूमि का अधिग्रहण कर मुआवजा देने का निर्देश

पहली याचिका पर हाईकोर्ट ने निरीक्षण, सीमांकन और मुआवजा प्रक्रिया के लिए 60 दिन की समय-सीमा तय की थी; अनुपालन में देरी के बाद मामला अवमानना तक पहुंचा। अब ताजा आदेश में अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी कर मुआवजा सुनिश्चित करने के लिए छह माह की समय-सीमा तय की गई है।

बिलासपुर। (वायरलेस न्यूज)

चमचमाती हाईवे परियोजनाओं के पीछे कई बार ऐसे लोगों की लंबी कानूनी लड़ाई की कहानी छिपी होती है, जिनकी जमीन पर विकास की सड़क तो बन जाती है, लेकिन उनके वैधानिक अधिकारों का समाधान वर्षों तक नहीं हो पाता। ऐसा ही मामला बिलासपुर जिले के ग्राम मुड़िपार निवासी किसान मनमेरा गोंड का है, जिन्होंने अपनी करीब 72 डिसमिल कृषि भूमि के वैधानिक अधिग्रहण और मुआवजे के लिए लगभग आठ वर्षों तक कानूनी संघर्ष किया।

रायपुर–बिलासपुर बायपास के निर्माण से किसान की भूमि प्रभावित हुई। जिस जमीन पर कभी गन्ने की फसल लहलहाती थी, उसी भूमि का उपयोग अब राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में हो चुका है। हालांकि, भूमि के विधिवत अधिग्रहण और मुआवजे का भुगतान लंबे समय तक लंबित रहा।

पहली याचिका पर हाईकोर्ट ने दिए थे स्पष्ट निर्देश

31 जनवरी 2025 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मनमेरा गोंड द्वारा दायर पहली याचिका पर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए थे। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य रखा गया था कि खसरा नंबर 411 एवं 451/5 की भूमि के कुछ हिस्से का उपयोग बायपास निर्माण में किया गया है, लेकिन एनएचएआई की ओर से उसका मुआवजा भुगतान नहीं किया गया है।

हाईकोर्ट ने संबंधित भूमि अधिग्रहण अधिकारी-सह-अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), बिलासपुर को मामले की जांच करने के निर्देश दिए थे। इसके तहत मौके का निरीक्षण एवं भूमि का सीमांकन किया जाना था।

न्यायालय ने विशेष रूप से निर्देश दिया था कि यदि जांच में यह स्थापित होता है कि याचिकाकर्ता की भूमि का उपयोग बायपास निर्माण के लिए किया गया है, तो कानून के अनुसार मुआवजा भुगतान के लिए आवश्यक कार्रवाई 60 दिनों के भीतर की जाए।

आदेश के अनुपालन में देरी, मामला पहुंचा अवमानना तक

पहले हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीमांकन की कार्रवाई की गई और यह सामने आया कि किसान की भूमि बायपास सड़क से प्रभावित हुई है। इसके बावजूद भूमि के औपचारिक अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

आदेश के पूर्ण अनुपालन में हुई देरी के कारण ग्राम मुड़िपार निवासी किसान मनमेरा गोंड को दोबारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा और अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।

अवमानना की कार्यवाही के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सीमांकन से यह स्पष्ट हो चुका है कि किसान की भूमि एनएचएआई द्वारा निर्मित बायपास सड़क से प्रभावित है।

यह भी सामने आया कि एनएचएआई ने संबंधित राजस्व अधिकारी को पत्र लिखकर प्रभावित भूमि का राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत अधिग्रहण करने तथा कानून के अनुसार मुआवजा भुगतान की कार्रवाई करने का अनुरोध किया था।

अवमानना याचिका के बाद हाईकोर्ट का नया निर्देश

25 अगस्त 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने संबंधित एसडीओ (राजस्व) को विषयगत भूमि के अधिग्रहण की कार्यवाही राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत प्रारंभ करने का निर्देश दिया।

हाईकोर्ट ने एनएचएआई को भी किसान मनमेरा गोंड को देय मुआवजे का शीघ्र भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

न्यायालय ने निर्देशित किया कि पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार, अधिमानतः छह माह के भीतर पूरी की जाए

इन निर्देशों के बाद न्यायालय ने माना कि अवमानना की कार्यवाही को आगे जारी रखने का अब कोई कारण नहीं है और अवमानना प्रकरण को समाप्त कर दिया गया।

जहां कभी लहलहाती थी गन्ने की फसल, अब वहीं दौड़ रहे हैं वाहन

इस मामले को खास बनाती है किसान की जमीन से जुड़ी कहानी।

ग्राम मुड़िपार निवासी मनमेरा गोंड की करीब 72 डिसमिल भूमि पर कभी गन्ने की फसल उगाई जाती थी। आज उसी प्रभावित भूमि पर बायपास हाईवे मौजूद है और उस पर लगातार वाहनों का आवागमन हो रहा है।

विकास परियोजना पूरी हो गई, सड़क बन गई और उस पर यातायात भी शुरू हो गया, लेकिन किसान को अपनी भूमि के कानूनी अधिग्रहण और उचित मुआवजे के लिए लगभग आठ वर्षों तक न्यायिक संघर्ष करना पड़ा।

अब हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद भूमि अधिग्रहण और मुआवजा भुगतान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए स्पष्ट न्यायिक दिशा-निर्देश जारी हो चुके हैं।

पहली याचिका से अवमानना तक पहुंचा मामला

यह मामला इस बात का उदाहरण है कि विकास परियोजनाओं के लिए निजी भूमि का उपयोग किए जाने के बाद भी उसके वैधानिक अधिकारों का संरक्षण कितना महत्वपूर्ण है।

एक ओर किसान की भूमि पर विकास की प्रतीक मानी जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग की सड़क खड़ी है, वहीं दूसरी ओर मनमेरा गोंड ने अपने वैधानिक अधिकारों और मुआवजे के लिए करीब आठ वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी।

मामले की शुरुआत पहली रिट याचिका से हुई, जिसमें हाईकोर्ट ने निरीक्षण और सीमांकन के बाद कानून के अनुसार मुआवजे की कार्रवाई के लिए 60 दिन का निर्देश दिया। आदेश के अनुपालन में देरी हुई तो मामला अवमानना कार्यवाही तक पहुंचा। अब ताजा आदेश में हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने और किसान को देय मुआवजा दिलाने की दिशा में निर्णायक निर्देश जारी किए हैं।

याचिकाकर्ता मनमेरा गोंड की ओर से अधिवक्ता नेल्सन पन्ना एवं अधिवक्ता आशुतोष मिश्रा ने पैरवी की।

हाईवे बना, लेकिन हक की लड़ाई जारी रही

एक तरफ विकास के लिए बनाई गई सड़क किसान की भूमि पर खड़ी हो गई, तो दूसरी तरफ किसान अपने हक के लिए न्यायालय की चौखट पर डटा रहा। करीब आठ वर्षों के इस कानूनी संघर्ष के बाद अब हाईकोर्ट के ताजा आदेश ने भूमि अधिग्रहण और मुआवजा भुगतान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए स्पष्ट समयबद्ध दिशा दे दी है।

Author Profile

Amit Mishra
Amit Mishra
अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
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