शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना भेदभावपूर्ण: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
विवाहित बेटे को लाभ और बेटी को इनकार नहीं चलेगा, वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव असंवैधानिक
बिलासपुर।(वायरलेस न्यूज) छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अनुकंपा नियुक्ति के एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल विवाह हो जाने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि संबंधित योजना में “पूर्णतः आश्रित पुत्री” को पात्र माना गया है, तो उसके विवाहित होने को अलग से अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने दो महिला आवेदकों की अपील स्वीकार करते हुए बैंक द्वारा उनकी अनुकंपा नियुक्ति के दावों को केवल विवाहिता होने के आधार पर खारिज किए जाने के आदेशों को निरस्त कर दिया।
निर्भरता होगी पात्रता का आधार
कोर्ट ने कहा कि बैंक की अनुकंपा नियुक्ति योजना में “पूर्णतः आश्रित पुत्र” और “पूर्णतः आश्रित पुत्री” का उल्लेख है, लेकिन पुत्री के लिए अविवाहित होना अनिवार्य नहीं किया गया है। योजना में विवाहित और अविवाहित पुत्री के बीच कोई अंतर नहीं है।
सुनवाई के दौरान बैंक ने स्वीकार किया कि कई विवाहित बेटों को अनुकंपा नियुक्ति दी गई है। बैंक ने यह तर्क दिया कि सामाजिक व्यवस्था के अनुसार विवाहित बेटा सामान्यतः अपने माता-पिता के परिवार की देखभाल करता है, जबकि विवाहित बेटी अपने वैवाहिक परिवार का हिस्सा बन जाती है।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक धारणाओं और लैंगिक रूढ़ियों के आधार पर प्रशासनिक निर्णय नहीं लिया जा सकता। यदि विवाह के बाद भी बेटे को आश्रित माना जा सकता है, तो केवल विवाह के आधार पर बेटी को आश्रित मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 14 और 15 के विपरीत माना
डिवीजन बेंच ने कहा कि विवाहित बेटियों को केवल उनकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से बाहर करना मनमाना और भेदभावपूर्ण है तथा यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 की भावना के विपरीत है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्भरता एक तथ्यात्मक प्रश्न है। केवल विवाह हो जाने से यह स्वतः नहीं माना जा सकता कि बेटी की अपने माता-पिता पर आर्थिक निर्भरता समाप्त हो गई है। संबंधित प्राधिकारी को वास्तविक निर्भरता की जांच करनी होगी।
पुराने मामलों को भी योजना का लाभ
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बैंक ने बाद में अपनी अनुकंपा नियुक्ति योजना को पुराने मामलों तक विस्तारित किया था। इसलिए जब बैंक ने स्वयं पुराने मामलों को योजना के दायरे में लाने का निर्णय लिया है, तो केवल इस आधार पर दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद कई वर्ष बीत चुके हैं।
कोर्ट ने माना कि योजना उपलब्ध नहीं होने की अवधि में हुई देरी के लिए याचिकाकर्ताओं को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
90 दिन में नियुक्ति देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने एकल पीठ के पूर्व आदेश तथा बैंक द्वारा जारी संबंधित अस्वीकृति आदेशों को निरस्त करते हुए दोनों याचिकाकर्ताओं को उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप उपयुक्त पदों पर अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियुक्ति पर विचार करते समय याचिकाकर्ताओं के विवाहित होने को अयोग्यता नहीं माना जाएगा। बैंक को प्रमाणित आदेश प्राप्त होने की तारीख से 90 दिनों के भीतर नियुक्ति आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अशुतोष मिश्रा एवं नेल्सन पन्ना द्वारा हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाएं/अपील प्रस्तुत की गईं। अधिवक्ताओं ने दलील दी कि अनुकंपा नियुक्ति योजना में “आश्रित पुत्री” के लिए विवाह को अयोग्यता नहीं बनाया गया है और विवाहित बेटों को लाभ देकर विवाहित बेटियों को केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर बाहर करना समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।
इन तर्कों से सहमत होते हुए हाईकोर्ट ने दोनों अपीलों को स्वीकार कर विवाहित बेटियों के पक्ष में महत्वपूर्ण राहत प्रदान की तथा 90 दिनों के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने का आदेश दिया।
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- अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
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