छत्तीसगढ़ कोलाहल नियंत्रण विधेयक, 2026: कोलाहल बढ़ेगा या कम होगा? ठोस संशोधन आवश्यक : नितिन सिंघवी

रायपुर, ( वायरलेस न्यूज 12 अक्टूबर) माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में लंबित जनहित याचिका के मद्देनज़र, माना जा रहा है कि केंद्र के ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 और राज्य के कोलाहल नियंत्रण अधिनियम, 1985 के बीच मौजूद असंगतियों को दूर करने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ कोलाहल नियंत्रण विधेयक, 2026 का प्रारूप तैयार किया गया है। इस प्रारूप पर जनता से आपत्तियाँ एवं सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।
पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण के लिए कार्यरत रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने छत्तीसगढ़ कोलाहल नियंत्रण विधेयक, 2026 के प्रारूप पर अपनी आपत्तियाँ एवं सुझाव प्रमुख सचिव, गृह विभाग एवं पुलिस विभाग को प्रस्तुत करते हुए कहा है कि ध्वनि प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण के लिए केवल नया कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। कानून ऐसा होना चाहिए, जो आम नागरिकों के स्वास्थ्य, नींद, मानसिक शांति और शांतिपूर्ण जीवन की वास्तविक रक्षा कर सके। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक में कई ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे कोलाहल नियंत्रित होने के बजाय बढ़ सकता है।
उच्च न्यायालय के आदेशों को विधेयक में भी नहीं मिली जगह
माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में नितिन सिंघवी विरुद्ध छत्तीसगढ़ राज्य, जनहित याचिका क्रमांक 112/2016 में दिनांक 06.12.2016 एवं 27.04.2017 के आदेशों के अनुसार यह सुनिश्चित किया जाना है कि किसी भी वाहन पर साउंड बॉक्स न बजे। पहली बार पकड़े जाने पर मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) की अनुमति से वाहन को छोड़ा जा सकेगा। दूसरी बार पकड़े जाने पर वाहन का परमिट निरस्त किया जाना है और परमिट माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही दोबारा बहाल किया जा सकता है। इस हेतु वाहनों का रिकॉर्ड भी रखा जाना है।
यद्यपि पिछले दस वर्षों में एक भी ऐसा प्रकरण सामने नहीं आया है, जिसमें कलेक्टर द्वारा जब्त वाहन को छोड़ा गया हो या उसी वाहन पर दोबारा स्पीकर मिलने पर माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार कार्रवाई की गई हो। सिंघवी ने सुझाव दिया कि माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के आदेशों को प्रस्तावित विधेयक में शामिल किया जाए। सिंघवी ने दावा किया कि यदि केवल इसी आदेश का पालन किया गया होता, तो डीजे की समस्या ही पैदा नहीं होती। इसके बावजूद, इन आदेशों को अभी भी प्रस्तावित विधेयक में शामिल नहीं किया गया है।
अब खूब बजा सकेंगे मैरिज गार्डन और निजी परिसरों में डीजे
नए विधेयक में बिना अनुमति ध्वनि प्रवर्धन यंत्र बजाने पर प्रतिबंध केवल सार्वजनिक स्थानों के लिए है। सार्वजनिक स्थान का अर्थ सड़क, जहाँ आम जनता की पहुँच हो, या ऐसा कोई स्थान जहाँ जनता का भ्रमण होता हो, बताया गया है। इसका मतलब है कि अब मैरिज गार्डन, निजी मकानों और अन्य निजी परिसरों में डीजे बजाने के लिए अनुमति की अनिवार्यता ख़त्म हो गई है।
निजी अस्पतालों के सामने बज सकेगा डीजे?
वर्तमान में जिला कलेक्टर के लागू आदेश के अनुसार मौन क्षेत्र (साइलेंस जोन) में निजी अस्पताल भी शामिल हैं। केंद्र के ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000 में अस्पताल की स्पष्ट परिभाषा दी गई है, जिसमें सरकारी एवं निजी अस्पतालों के साथ नर्सिंग होम और क्लिनिक भी शामिल हैं। इसके विपरीत, प्रस्तावित विधेयक में निजी अस्पतालों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। विधेयक के अनुसार, मौन क्षेत्र में अस्पताल, नर्सिंग होम, शैक्षणिक संस्थाएँ, छात्रावास, न्यायालय तथा केंद्र या राज्य सरकार के कार्यालय शामिल हैं। सिंघवी ने सुझाव दिया कि केंद्र के नियमों की तरह नए विधेयक में भी निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लिनिक को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए।
साइलेंस जोन की सीमा 200 मीटर से घटाकर 100 मीटर की गई
वर्तमान 1985 के अधिनियम के अंतर्गत शांत क्षेत्र से 200 मीटर की दूरी के भीतर लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिबंध है। इसके विपरीत, प्रस्तावित 2026 विधेयक में शांत क्षेत्र के लिए 100 मीटर की सीमा निर्धारित की गई है। सिंघवी ने सुझाव दिया कि पुराने अधिनियम की 200 मीटर की सुरक्षा सीमा को कम करने के बजाय, शक्तिशाली डीजे एवं ध्वनि प्रवर्धन यंत्रों की क्षमता को देखते हुए इसे कम-से-कम 300 मीटर किया जाना चाहिए।
दिन में लगातार छह घंटे डीजे बजाने की छूट
प्रस्तावित विधेयक में रैली, सार्वजनिक कार्यक्रमों और उत्सवों के लिए दिन के समय अनुमति लेकर अधिकतम छह घंटे तक ध्वनि प्रवर्धन यंत्रों के उपयोग का प्रावधान है। केंद्र के नियमों में इस प्रकार की छह घंटे की छूट नहीं है। सिंघवी ने कहा कि जब केंद्र के नियमों के अनुरूप प्रावधान बनाए जा रहे हैं, तो इस प्रकार की छूट नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि इसका दुरुपयोग हो सकता है।
रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक बिना विशेष छूट के प्रतिबंध लागू हो
प्रस्तावित विधेयक में निर्धारित परिस्थितियों में एक कैलेंडर वर्ष में अधिकतम 15 दिनों तक मध्यरात्रि तक ध्वनि प्रवर्धन यंत्रों के उपयोग की अनुमति देने का प्रावधान है। जब कि मध्यरात्रि परिभाषित नहीं की गई है। सिंघवी ने आशंका जताई कि इस छूट का लाभ उठाकर डीजे संचालक देर रात तक डीजे बजा सकते हैं। उन्होंने मांग की कि विशेष छूट का प्रावधान हटाकर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक प्रतिबंध लागू रखा जाए।
स्कूलों के मैदानों के पास भी बज सकेंगे डीजे
प्रस्तावित विधेयक में शैक्षणिक संस्था की परिभाषा में विद्यालय, मदरसा, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, व्यावसायिक अकादमी, प्रशिक्षण संस्थान तथा अन्य शैक्षणिक प्रतिष्ठानों के साथ-साथ शिक्षा के लिए आवश्यक समस्त परिसर को शामिल किया गया है। परंतु केंद्र के वर्ष 2000 के नियमों की भाषा के अनुरूप खेलकूद के मैदानों एवं अन्य परिसरों को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है। सिंघवी ने सुझाव दिया कि इनका भी स्पष्ट उल्लेख किया जाए।
जब्त उपकरणों की नीलामी के बजाय अंतिम जब्ती के बाद नष्ट करने का प्रावधान हो
प्रस्तावित विधेयक में जब्त किए गए ध्वनि प्रवर्धन यंत्रों एवं अन्य उपकरणों की नीलामी का प्रावधान है। नीलामी के बाद यही उपकरण दोबारा डीजे संचालकों या अन्य व्यक्तियों के हाथों में पहुँच सकते हैं और उनका फिर से दुरुपयोग हो सकता है।
सिंघवी ने मांग की कि विधिसम्मत प्रक्रिया पूरी होने और अंतिम जब्ती सुनिश्चित होने के बाद ऐसे उपकरणों को नष्ट करने का प्रावधान किया जाए, ताकि उनका दोबारा ध्वनि प्रदूषण फैलाने के लिए इस्तेमाल न हो सके। जब्ती, अपील और अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए यह व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
प्रस्तावित जुर्माना इतना प्रभावी हो कि उल्लंघन करना महँगा पड़े
सिंघवी ने बताया कि केंद्र के नियम, 2000 के उल्लंघन पर अधिकतम पंद्रह लाख रुपये की पेनल्टी का प्रावधान है। प्रस्तावित विधेयक में प्रथम अपराध के लिए न्यूनतम ₹50,000 तथा दूसरे अपराध के लिए न्यूनतम ₹1 लाख के जुर्माने का प्रावधान है।
सिंघवी के अनुसार, अत्यधिक तेज ध्वनि से आम नागरिकों को होने वाली परेशानी और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए दंड ऐसा होना चाहिए, जिससे उल्लंघन करने वालों में वास्तविक रोक पैदा हो। उन्होंने प्रथम अपराध के लिए ₹5 लाख से ₹15 लाख तक तथा दूसरे अपराध के लिए ₹10 लाख से ₹15 लाख तक जुर्माने का प्रावधान करने का सुझाव दिया है।
बार-बार ध्वनि प्रदूषण फैलाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो
वर्ष 1985 के अधिनियम में प्रथम उल्लंघन पर अधिकतम छह माह के और पुनः दोषसिद्धि पर एक साल के कारावास का प्रावधान है। प्रस्तावित विधेयक में प्रथम दोषसिद्धि पर अधिकतम छह माह और पुनः दोषसिद्धि पर छह माह से दो वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, बाद के अपराधों को गैर-जमानती बनाया गया है।
सिंघवी ने कहा कि वर्तमान कानूनों में सजा का प्रावधान होने के बावजूद छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के पश्चात एक भी उल्लंघनकर्ता को सजा नहीं दिलाई जा सकी है। जिस प्रकार कोलाहल समाज का कलंक बन गया है, उसे देखते हुए दंड के प्रावधान और अधिक कठोर किए जाने चाहिए। उन्होंने प्रथम उल्लंघन को भी गैर-जमानती बनाने का सुझाव दिया, ताकि ध्वनि प्रदूषण फैलाने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई हो सके।
कानून का उद्देश्य केवल अनुमति देना नहीं, जनता को राहत देना होना चाहिए
सिंघवी ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण को केवल त्योहारों, रैलियों या आयोजनों की समस्या मानकर नहीं देखा जा सकता। यह उन नागरिकों की भी समस्या है, जिन्हें अपने घरों में सोने, पढ़ने, काम करने और शांतिपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने राज्य शासन से मांग की कि प्रस्तावित विधेयक को अंतिम रूप देने से पहले सभी आपत्तियों पर गंभीरता से विचार किया जाए, उच्च न्यायालय के प्रासंगिक आदेशों को समुचित रूप से शामिल किया जाए और केंद्रीय नियमों के अनुरूप स्पष्ट एवं प्रभावी प्रावधान बनाए जाएँ।
नितिन सिंघवी
9826126200
Author Profile

- अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
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