“आत्ममुग्ध चिंगारी “

(वायरलेस न्यूज नेटवर्क)

हिंदी जगत में आत्मकथा लिखने की परिपाटी सदियों से है।कलम चलाने वाला अपने जीवन में कभी न कभी आत्मकथा लिखता ही है।रही आत्ममुग्धता की बात तो जरा इस बात पर गौर फरमाएं कि आत्मकथा और है क्या आत्ममुग्धता नहीं है तो? मैंने ये किया,मैंने वो किया,मैंने कितनी मुसीबतें उठाईं, बच्चे पाले,घर बनाया इत्यादि।ये बात सत्य ही है किंतु किसी लिखने वाले ने अपने आप को आत्ममुग्ध नहीं कहा।भाई अरुण तिवारी जी वो प्रथम शख़्स हैं जिन्होंने यह बात कही।इतना ही नहीं उन्होंने इस बात को पुस्तक लिखकर साबित कर दिया कि वे अपनी आत्मकथा नहीं आत्ममुग्धता लिख रहे हैं।उनकी सद्यः प्रकाशित कृति "आत्ममुग्ध चिंगारी "इस बात की विधिवत घोषणा ही है। लिखा सबने आत्ममुग्ध होकर पर किसी ने स्वीकारा नहीं अपितु आत्मकथा नाम देकर उसे ढांक दिया।भाई अरुण ने छिपाया नहीं क्योंकि उनकी नियत में कहीं खोट नहीं।उन्होंने लिखा वो हर दृष्टि से आत्मम्यग्ध होने लायक ही है।उनके कार्य है ऐसे रहे हैं जो उन्हें खुद को आत्ममुग्ध करने के लिए पर्याप्त कारण रखते हैं। हर वर्ष बरसात के मौके पर वृक्षारोपण अभियान चलता है पर रोपित पौधे कितने लोगों के पेड़ बन पाते हैं।भाई अरुण ने कलचुरि कालीन माँ महामाया की नगरी रतनपुर में एक पहाड़ी के नीचे बंजर और पथरीली भूमि में जंगल ही स्थापित कर दिया।आम,जामुन,नीम, बरगद,पीपल,कदंब के हजारों पेड़ वहां लहरा रहे हैं।यह बात उन्हें ही नहीं ,उन पर मुझे भी आत्ममुग्ध होने के लिए बाध्य कर देता है। मैं जब भी अरुण तिवारी जी को देखता हूं मुझे दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां बरबस याद आती हैं-

” मत कहो आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।”
इन पंक्तियों की याद आने की वजह यह है कि भाई अरुण जी भी वही शख्शियत हैं जो कुहरे को कुहरा,बुराइयों को बुरा कहने का साहस रखते हैं।यही वजह है कि वे शीघ्र बुरे बन जाते हैं।उनके राजनीतिक जीवन को लें,सामाजिक जीवन को लें,पारिवारिक जीवन को लें हर जगह वो बुरे दिखते हैं।क्या सच कहना बुराई है ?भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भगवत गीता में जिस सत्य को बताया,महात्मा गांधी जी ने सारा जीवन जिस सत्य की महिमा उजागर क्या वह सत्य बुराई है ?क्या सत्य बोलने वाला बुरा है ? इन सवालों के जवाब शायद कोई नहीं दे सके।सब यह कहेंगे कि आदमी को सत्य बोलने चाहिए पर यह स्पष्ट नहीं करेंगे कि सच कहने वाला बुरा क्यों बनता है।
भाई अरुण तिवारी जी ने अपने जीवन में सत्य को आत्मसात किया किन्तु वे गांधी नहीं बन सके।इस दो रंगी दुनिया में दोस्त कह कुछ जाता है और किया कुछ जाता है।सत्य का आडम्बर रचो और झूठ से काम लो।हर तरफ वाहवाही मिलेगी,हर कोई आपको सर्वश्रेष्ठ बतायेगा।
उनकी यह किताब आप पढ़ेंगे तो उनके गुणों से वाकिफ़ होंगे और उनके उन गुणों पर आप भी मुग्ध हो जाएंगे।वे एक बार सीपत जैसे गांव से विधायक बनें और प्रदेश की राजनीति में छा गये।इसके बाद दोबारा विधायक नहीं बनें।ऐसा नहीं है कि सीपत क्षेत्र की जनता उन्हें दोबारा नहीं चुनती।दरअसल उन्हें दोबारा टिकट दी ही नहीं गई।वज़ह उनका सच बोलना ही रहा है और यह भी की सच्चाई बर्दाश्त करने की हममें क्षमता ही नहीं रह गई। वर्तमान लोग अपनी तारीफ ही पसंद करते हैं।आलोचना करके देखिए आपका अपना बाप भी नाराज हो जाएगा और वह आपकी तरफ देखेगा भी नहीं।यह हमारे समाज,राजनीति और वर्तमान परिवेश की विडंबना है जो सच नहीं सह सकती।
भाई अरुण जी की यह किताब श्री विनायक प्रकाशन ,सुदामा नगर ,इंदौर से प्रकाशित है।पुस्तक में उनके पारिवारिक,सामाजिक और राजनैतिक जीवन की महत्पूर्ण तस्वीरें भी है।पुस्तक की प्रिंटिंग साफ है।भाषा-शैली अत्यंत सहज और सरल है।आम पाठक भी लिखे के मर्म को आसानी से समझ सकता है।भाई अरुण तिवारी जी से इस मौके पर यह कहना चाहूंगा-कोई कुछ भी कहे,हजार तूफान-झंझावात आये आप अपनी राह चलिए,आप अपने आदर्शों पर चलिए,अपनी ईमानदारी,निष्ठा और प्रतिबद्धता पर कायम रहिये,कोई कुछ भी कहे आप अपनी राह पर बढ़ते जाइये,मंजिलें खुद ब खुद आपका पता ढूंढ लेंगी,वक़्त खुद आपकी इज्जत करेगा।इस प्रकाशन पर मैं आपको ह्र्दयतल से बधाई देता हूं और यह अपेक्षा करता हूं कि आप ऐसे ही सच्चाइयों को उदघाटित करते रहें।उन्हें कोई सुने न सुने जमाना सुन रहा है-
” क्या हुश्न ने समझा है,
क्या इश्क़ ने जाना है
हम ख़ाक नशीनों के
ठोकर में जमाना है। “
भाई अरुण मुझे भी कोहरे ने ढंक रखा था।मैं कहीं अंधेरे में गुम था मैं सत्य पर डटा रहा,अड़ा रहा सत्य की रहा नहीं छोड़ी और कहीं अंधेरे में गुम रहा।आज असत्य कहीं अंधेरे में गुम है।आप भी आड़े रहिये, डटे रहिये, अपनी राह मत छोड़िए।एक दिन सत्य ही आपकी चिन्हारी बनेगी,कुहरा तिरोहित होगा और अवश्यम्भावी होगा।श्रीकांत वर्मा जी के शब्दों में-” जो रचेगा,वह बचेगा,जी नहीं रचेगा वह कैसे बचेगा ? “
मुझे बचना है इसलिए रचना है और रचना है इसलिये बचना भी है।भाई अरुण जी आप भी बच-बचकर रचिये और रचकर बचिए।आप रहेंगे और आपका रचना रह जाएगा।फिर एक दिन आपको इतिहास खुद रचेगा।यह अवश्यंभावी है।बड़ा होने के नाते यह मेरा आशीर्वाद है,दुआ है और शुभकामनाएं भी हैं आपको।