रंगा-रंग अख़बारों के रंगा-पाठक भी होते हैं।जरा अपने आसपास गर्दन घुमाकर देंखें,ऐसे लोग बहुतायत मिलेंगे जिनके लिए अख़बार के निजी एवं विशेष मायने होते हैं।

(छत्तीसगढ़ के जाने माने कार्टूनिस्ट प्रदीप आर्य की कूची से)
अख़बारों के एक नम्बर के पाठक हमारे नेता होते हैं।वे सुबह उठकर मुंह बाद में धोते हैं,पहले अख़बार देखते हैं।इस समय लगता है मानों वे आईना हो।दरअसल वे अख़बारों में अपना चेहरा निहारते हैं हालांकि उनका चेहरा दर्शनीय नहीं होता फिर भी पृष्ठ दर पृष्ठ पलटकर वे देखेंगे जरूर।
समाचारों को देखने की उनकी पहली प्राथमिकता यह होती है कि उनके कार्यक्रमों को किस अख़बार ने कैसी कव्हरेज दी है ?दूसरी प्राथमिकता उनके उदघाटन और शिलान्यास के कार्यक्रमों का विज्ञापन किन-किन लोगों ने छपाया है?विज्ञापनों में उनकी कौन सी और कैसी तस्वीर लगी है ?
तीसरी प्राथमिकता यह होती है कि किस विपक्षी लीडर ने उनके बारे में क्या बयान दिया है?इसे देखने के बाद उनका प्रेसर बढ़ जाता है और वे टॉयलेट में घुस जाते हैं।यदि जरूरत हुआ तो अख़बार को भी वे टॉयलेट में ले जाते हैं और वहां निर्भय होकर उसे बांचते हैं।
दूसरे नम्बर के वाचक पुलिस वाले होते हैं जो यह जानने के लिए पृष्ठ पर पृष्ठ पलटते हैं कि किन लोगों ने उनके खिलाफ शिकायत एवं बयानबाज़ी की है।ट्रांसफर पर कौन साहब जा रहे हैं और उनकी जगह कौन आने वाले हैं ?दोनों प्रकारों को सलामी देना उनका फर्ज़ होता है।जाने वाले और आने वाले से मधुर संबंध बनाना निर्बाध काम करने के लिए अत्यंत आवश्यक होता है।
तीसरे नम्बर के वाचक सभी विभागों के अफ़सर होते हैं।ज़्यादातर उनके पास अख़बार बांचने का समय नहीं होता।उन्हें तो ख़बरों की ख़बर उनके चम्मच उस अख़बार सहित देते हैं।उन्हें यह भी देखना होता है कि किस मद में कितना आबंटन प्राप्त होने वाला है ?कितने का कमीशन बन जाएगा ?उनके खिलाफ़ किस मंत्री के पास शिकायत हुई है?वे निश्चिंत होकर टॉयलेट जाना पसंद करते हैं ताकि एक-दो घण्टे ऑफिस टाइम के वहां बिता सकें।
चौथे नम्बर के वाचक उद्योगपति और व्यापारी होते हैं।वे समाचार पत्र के सीधे कामर्शियल पन्ने खोलते हैं और देखते हैं कि सेंसेक्स,निफ्टी कितने ऊंचे या नीचे गिरे हैं?टैक्स बचाने की गुंजाइश कहां है?उनकी नज़र इस बात पर भी रहती है कि एसीबी का छापा कहां पड़ा है ?इन सब बातों से निपटकर वे टॉयलेट जाना पसंद करते हैं।
पांचवें नम्बर की वाचक आम जनता होती है जो ज़्यादातर बाज़ार भाव से अख़बार पढ़ना शुरू करती है।किस चीज के दाम बढ़े किस चीज के घटे इस पर उनके घरेलू बजट का दारोमदार रहता है।इसके बाद वे हर ख़बर पढ़ जाते हैं क्या पता कहां कोई जीन्स कम दाम में मिल जाए, इसका ठिकाना वे ढूंढते हैं।रसोई गैस के दाम में बढ़ोतरी की आंच तो सीधे उनके चूल्हे तक पहुंचती है।
छठे नम्बर के पाठक बेरोजगार होते हैं।वे हर पृष्ठ पलटकर वैकेंसी निहारते हैं।जरूरत पड़ी तो कटिंग काटकर वे रख लेते हैं।वे भी सारे समाचार चाट जाते हैं।इसकी वज़ह उनकी बेरोजगारी ही होती है।वे सोचते हैं क्या पता कि ख़बर से उनके भाग्योदय हो जाए।
अविवाहित युवतियों के पिता भी अख़बारों के अच्छे पाठक होते हैं।वे खासकर वधु चाहिए वाले कॉलम पर नज़र रखते हैं ताकि अपनी बेटियों के हाथ पीले कर सकें।शादी और हाथ पीले होने के बीच क्या संबंध है हमें नहीं पता।आपको पता हो तो अवश्य हमें बताएं।
ठलुहे किस्म के लोग भी अच्छे बाँचनहारी होते हैं।दरअसल उनके पास समय बहुत होता है और करने को कुछ भी नहीं होता।कर्मचारी गण खुद अख़बार नहीं खरीदते पर पढ़ते जरूर हैं क्योंकि उन्हें महंगाई भत्ता बढ़ने,ट्रांसफर आदि का पता अख़बार से ही चलता है।
इस सर्वे में जरूर कुछ लोग छूटे होंगे ,वे अपनी क्वॉलिटी खुद तय कर लें।
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