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देश के युवाओं को श्रीकृष्ण से सीखना होगा( श्रीपाद अवधूत की कलम से साभार )

On: September 4, 2026 5:23 AM

बांगरु_बाण

देश के युवाओं को श्रीकृष्ण से सीखना होगा

( श्रीपाद अवधूत की कलम से साभार )

युवाओं! कृष्ण को केवल पूजिए मत, कृष्ण को समझिए; यदि वास्तविक स्वतंत्रता चाहिए तो पहले आत्मसंयम सीखिए !!!

विशेष_नोट

लेख बड़ा है इसका तात्पर्य यह नहीं होता कि वह पढ़ने योग्य नहीं होता। विषय के संपूर्ण ज्ञान हेतु, विषय की गहराई एवं विषय का प्रस्तुतीकरण थोड़ा बड़ा ही करना पड़ता है। तभी यह अच्छे से समझ में आता है इसलिए इस लेख को अंत तक अवश्य पढ़ियेगा ।
🙏

आज भारत का युवा जाग रहा है..!! वह प्रश्न पूछ रहा है..?? व्यवस्था से जवाब मांग रहा है..?? अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहा है..!!! यह स्वागत योग्य है…!!! लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध नहीं है…!!! अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना, सरकार से नीतिगत उत्तर मांगना और अपनी शिक्षा, रोजगार, परीक्षा, भविष्य व अधिकारों के लिए संघर्ष करना भी अपराध नहीं है…!!!

किंतु एक गंभीर प्रश्न यह है— हम विरोध किस भाषा में कर रहे हैं..?

👉 क्या अपनी बात मनवाने के लिए गाली आवश्यक है..?
👉 क्या असहमति व्यक्त करने के लिए अपमान अनिवार्य है..?
👉 क्या मंत्री, विधायक, सांसद, अधिकारी या शिक्षक को घेरकर उनका सार्वजनिक अपमान करना ही लोकतांत्रिक चेतना है..?
👉 क्या छोटी-सी समस्या पर सड़क बंद कर देना, छात्रावास या विद्यालय में अनुशासन तोड़ना और हर असहमति को उपद्रव बना देना ही स्वतंत्रता है…?
👉 और सबसे चिंताजनक प्रश्न यह कि जब 8-10 वर्ष के अबोध बच्चे भी सड़क-जाम, नारेबाजी और राजनीतिक टकराव की आक्रामक शैली सीखने लगें, तब हम उन्हें नागरिक अधिकार सिखा रहे हैं या अहंकार या अराजकता …?

विदेशी अनुकरण की अंधी दौड़ में हमने अपनी ही भावी पीढ़ी को ‘Gen Z’ और ‘Gen Alpha’ जैसे सांचों में ढालकर उनकी उग्रता को आधुनिकता मान लिया है।

अभी कल के ही एक विख्यात समाचार पत्र ( नाम नहीं दे रहे ) की खबर है जिसमें उन्होंने लिखा है जेन जी नौकरी के लिए योग्य नहीं है ।
37% बॉस नए ग्रेजुएट की जगह रोबोट चुनने को तैयार है।
कारण स्पष्ट है जेन जी में कम्युनिकेशन की कमी है, पेशेवर कौशल की कमी है।
एक सर्वे के अनुसार 75% जेन जी का अपने वर्कप्लेस पर प्रदर्शन असंतोष जनक है।
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की मनोविज्ञान के प्रोफेसर टेसा वेस्ट के अनुसार जैन जी कौशल सीखने के मामले में बहुत कमजोर है । इसका मूल कारण उनके बातचीत का ढंग, बहस करना, असहमति व्यक्त करना और स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ मानना है।
इन सारे उदाहरण को देखते हुए आज आवश्यकता बच्चों और युवाओं को दबाने की नहीं, बल्कि उन्हें #कृष्ण सिखाने की है।

कृष्ण केवल मंदिर में रखी प्रतिमा या जन्माष्टमी की झांकी नहीं हैं। कृष्ण जीवन जीने का संपूर्ण विज्ञान हैं।

  1. कृष्ण का पहला पाठ: स्वतंत्र बनो, स्वच्छंद नहीं

आज की पीढ़ी असीम स्वतंत्रता चाहती है। कृष्ण भी स्वतंत्र थे, किंतु उनकी स्वतंत्रता मर्यादाविहीन स्वच्छंदता नहीं थी। उन्होंने सदैव समाज, धर्म और राष्ट्र के प्रश्नों को व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर रखा।
श्रीमद्भगवद्गीता (3.21) में श्रीकृष्ण कहते हैं:

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनाः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
(अर्थात श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, अन्य जन भी वैसा ही आचरण करते हैं। वे जो आदर्श स्थापित करते हैं, समस्त समाज उसी का अनुसरण करता है )
स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि मैं जो चाहूँ वही करूँ। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ है—सत्य और लोकहित को समझकर जो कर्तव्य बनता है, उसे निष्ठापूर्वक करने में स्वतंत्र रहूँ।

  1. माखन-चोरी: चोरी का समर्थन नहीं, सार-तत्व का चयन

माखन-चोरी केवल एक बाल-क्रीड़ा नहीं थी, बल्कि उसका गहरा दार्शनिक और सामाजिक मर्म था। दूध से दही और मंथन से जो सार निकलता है, वही माखन है। ब्रज का माखन मथुरा के शोषक तंत्र को जाने से रोककर कृष्ण ने स्थानीय बालकों के पोषण और सार-तत्व के संरक्षण का संदेश दिया।
श्रीमद्भागवत (10.9.8) में वर्णन आता है कि माता यशोदा स्वयं आत्ममंथन के भाव से दधि-मंथन करती हैं:

दधिनिर्मन्थने मातुस्तत्र कृष्णोऽभ्यगात्तदा…
दूध प्रचुर है, लेकिन सार माखन में है।
आज सोशल मीडिया पर सूचनाओं की बाढ़ है, लेकिन सत्य कहाँ है ?
बहसें अनगिनत हैं, लेकिन विवेक कहाँ है?
आज के युवा को सूचना के इस कोलाहल से #माखन यानी सत्य और सार-तत्व निकालना सीखना होगा। हर वायरल वीडियो अंतिम सत्य नहीं होता और हर ट्रेंड न्याय नहीं होता।

  1. कृष्ण की बांसुरी: बोलने से पहले सुनना सीखो

कृष्ण के हाथ में सुदर्शन चक्र से पहले बांसुरी है। बांसुरी की अपनी कोई स्वतंत्र ध्वनि नहीं होती , वह भीतर से पूर्णतः रिक्त (अहंकार-शून्य) होती है। जब कृष्ण उसमें प्राण फूंकते हैं, तब दिव्य स्वर उत्पन्न होते हैं जिसे सुनकर समस्त चराचर मुग्ध हो जाता है।
जिस मन में दंभ और पूर्वाग्रह भरे हों, वहाँ विवेक का स्वर कैसे गूंज सकता है? आज हर कोई चिल्लाना और लिखना चाहता है, लेकिन सुनने का धैर्य किसी के पास नहीं। वाणी की शक्ति संयम में है, गाली में नहीं। अश्लील भाषा विचार की शक्ति नहीं, बल्कि तर्क के खोखलेपन का प्रमाण है।

गीता (17.15) में वाणी की तपस्या का स्पष्ट विधान है:

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

(अर्थात जो वाणी किसी को उद्वेग न पहुँचाने वाली, सत्य, प्रिय, हितकारी और स्वाध्याय का अभ्यास कराने वाली हो—वही वाणी संबंधी तप कही गई है।)

  1. अन्याय सहा नहीं, लेकिन सीधे सड़क भी नहीं घेरी

कृष्ण अधर्म के सम्मुख कभी नहीं झुके, किंतु उनका प्रतिरोध अंधाधुंध नारेबाजी या उपद्रव नहीं था। उन्होंने पहले नीति, कूटनीति, संगठन और संवाद का मार्ग चुना। महाभारत युद्ध से पूर्व वे स्वयं शांतिदूत बनकर कौरव सभा में गए और पांडवों के लिए केवल पाँच गाँवों की न्यूनतम मांग रखी ताकि रक्तपात टल सके।

उद्योग पर्व में श्रीकृष्ण का स्पष्ट उद्घोष है:

अहं हि तत् करिष्यामि परं कौतूहलं हि मे।
शमं यदि चिकीर्षामि कुरूणामपि चात्मनः॥

(अर्थात मेरा पूरा प्रयास रहेगा कि बिना विनाश के कौरवों और पांडवों के बीच शांति स्थापित हो सके।)

संघर्ष हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं। आज का चलन उल्टा है—पहले सड़क जाम, पहले घेराव, पहले अभद्रता और फिर संवाद। कृष्ण का मार्ग व्यवस्था के सम्मान के साथ न्याय की मांग करना सिखाता है।

  1. गोवर्धन पूजा: केवल विरोध नहीं, ठोस भी विकल्प दो

गोवर्धन प्रसंग में श्रीकृष्ण ने इंद्र की पारंपरिक पूजा पर तार्किक प्रश्न उठाया। ब्रज की अर्थव्यवस्था और जीवन इंद्र के काल्पनिक भय पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष गोवर्धन पर्वत, गायों, वनों और जनश्रम पर टिकी थी। कृष्ण ने केवल यह नहीं कहा कि ‘यह गलत है’, बल्कि एक व्यावहारिक और पर्यावरण-सम्मत विकल्प सामने रखा।

श्रीमद्भागवत (10.24.25) में श्रीकृष्ण कहते हैं:

तस्माद् भजध्वं गोवर्धनं च गाश्च द्विजांस्तथा…
(अर्थात इसलिए हमें प्रत्यक्ष उपकार करने वाले इस पर्वत, गायों और सत्पुरुषों का सम्मान व संवर्धन करना चाहिए )

नेतृत्व वही है जो केवल समस्या न गिनाए, बल्कि समाधान का खाका भी प्रस्तुत करे। ‘सिस्टम खराब है’ कहना आसान है; बेहतर सिस्टम की कार्य-योजना प्रस्तुत करना असली नेतृत्व है।

  1. गोवर्धन उठाने का अर्थ: संकट में छत्र बनना

जब इंद्र का कोप बरसा, तब कृष्ण भागकर सुरक्षित स्थान पर नहीं छिपे। उन्होंने अपनी कनिष्ठिका पर गोवर्धन उठाकर समस्त समाज और पशुधन को सुरक्षा दी।

सच्चा_नेता वह नहीं होता जो भीड़ को आगे कर खुद सुरक्षित हो जाए या जो सबसे ऊंची आवाज में गाली दे सके। नेता वह है जो संकट के समय समाज के लिए ढाल बनकर खड़ा हो।

  1. पहले विवेक, फिर शक्ति: अर्जुन को हथियार से पहले ज्ञान

युद्धभूमि में जब अर्जुन मोहग्रस्त और उद्विग्न हुआ, तब कृष्ण ने उसे यह नहीं कहा कि क्रोध में आओ और सबको नष्ट कर दो।
उन्होंने पहले अर्जुन का भ्रम दूर किया, कर्तव्य समझाया और आत्म-तत्व का बोध कराया।

गीता (2.48) का यह अमर सूत्र युवा मानस की आधारशिला होना चाहिए :

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

(अर्थात हे धनंजय! आसक्ति और उद्वेग को त्यागकर, सफलता और असफलता में सम-भाव रखते हुए अपने कर्तव्य कर्म करो। यह समत्व ही योग है।)

राष्ट्र-निर्माण की वास्तविक शुरुआत देश बदलने की शुरुआत केवल सत्ता या व्यवस्था पर पत्थर उछालने से नहीं होती – स्वयं के आचरण को तपाने से होती है।
समय पर उठना, निष्ठा से अध्ययन करना, शरीर को स्वस्थ रखना, माता-पिता व गुरुजनों का आदर करना, कौशल सीखना, कर चुकाना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और असहमति में भी शिष्टाचार बनाए रखना—यही वास्तविक देशसेवा है।
धर्म का अर्थ न तो कायरता है और न ही निरंकुश उग्रता। धर्म का अर्थ है—जहाँ आवश्यक हो वहाँ विनम्रता, जहाँ अन्याय हो वहाँ निर्भीक साहस, और हर परिस्थिति में अडिग विवेक है।

अतः भारत को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है:

जिनके हाथ में मोबाइल हो, तो वे ज्ञान और कौशल खोजें।
जिनके हाथ में कलम हो, तो वे समस्याओं के ठोस समाधान लिखें।
जिनके हाथ में तिरंगा हो, तो वे उसके राष्ट्र-गौरव की रक्षा करें।
और यदि कभी लोकतांत्रिक अधिकार के लिए हाथ में आंदोलन का झंडा उठाना भी पड़े—तो वाणी में संयम, व्यवहार में मर्यादा और हृदय में राष्ट्रहित सर्वोपरि रहे।
भारत का भविष्य केवल यह तय नहीं करेगा कि आने वाली व्यवस्थाएं कैसी होंगी; यह भी तय करेगा कि हमारी सांस्कृतिक चेतना कितनी अक्षुण्ण रहेगी।
आज के भारत को इसी ‘कृष्ण-तत्व’ के जागरण की सर्वाधिक आवश्यकता है…!!!

आप सबके भीतर विराजित उस विवेकवान कृष्ण-तत्व को सादर नमन…!!!

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Author Profile

Amit Mishra
Amit Mishra
अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

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