“पितृपक्ष में सियासी कौआ बोला—जागो रे बघुआ!”
पितृपक्ष में ‘कौआ सांग’ की कांव-कांव, बघुआ को जगाने निकले अमित जोगी!

रायपुर। (अमित मिश्रा वायरलेस न्यूज) पितृपक्ष में वैसे तो घर-आंगन में कौए की कांव-कांव को परंपरा और पितरों की याद से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ की सियासत में इस बार यही कांव-कांव कुछ अलग अंदाज में सुनाई दे रही है। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी का नया ‘कौआ सॉन्ग’ सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। गीत के बोल हैं— “जागो रे बघुआ छत्तीसगढ़ के, कोलिहा मन ललकारत हे।”
अब पितृपक्ष का मौसम हो और कौआ चर्चा में न आए, ऐसा कैसे हो सकता है! फर्क बस इतना है कि इस बार कौआ छत पर बैठकर दाना चुगने के बजाय सियासी संदेश लेकर आया है। अमित जोगी ने गीत के साथ “हमर मंदिर, हमर देवता, हमर माटी” का संदेश देते हुए इसे छत्तीसगढ़ी अस्मिता और माटी से जोड़ा है।
गीत में मंदिर की छत पर बैठे कौए को लेकर प्रतीकात्मक अंदाज अपनाया गया है और ‘बघुआ’ को जागने का आह्वान किया गया है। गीत में ‘कोलिहा’ यानी सियार का भी प्रतीकात्मक इस्तेमाल हुआ है। अमित जोगी ने किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल का सीधे नाम नहीं लिया है, इसलिए गीत के संकेतों का राजनीतिक अर्थ निकालने का सिलसिला अब सोशल मीडिया पर अलग-अलग अंदाज में चल पड़ा है।
कांव-कांव के अपने-अपने अर्थ
सोशल मीडिया की सियासत में अब कांव-कांव भी कमाल करने लगी है। कोई इसे छत्तीसगढ़ की अस्मिता की आवाज बता रहा है, तो कोई इसे मौजूदा राजनीतिक माहौल पर तंज मान रहा है। कुछ सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं में गीत को राजनीतिक भविष्य और संभावित सियासी समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है—हालांकि इन अटकलों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
व्यंग्यकारों के लिए तो यह ‘कौआ सांग’ मानो पितृपक्ष का नया सियासी संस्करण बन गया है—जहां सवाल यह नहीं कि कौआ किसके घर आया, बल्कि यह है कि कौआ किसके लिए कांव-कांव कर रहा है और बघुआ किसे जगाने निकला है?
और फिर छत्तीसगढ़ी राजनीति में प्रतीकों की अपनी अलग परंपरा रही है। ऐसे में ‘कौआ’, ‘बघुआ’ और ‘कोलिहा’ जैसे पात्रों की एंट्री ने सोशल मीडिया के राजनीतिक मंच पर नई पटकथा जरूर तैयार कर दी है।
फिलहाल इतना तय है कि पितृपक्ष में कौए को लेकर चली आ रही पारंपरिक कांव-कांव इस बार सोशल मीडिया के रास्ते सियासी गलियों तक पहुंच गई है। अब देखना यह है कि यह ‘कौआ सांग’ सिर्फ गीत बनकर रह जाता है या छत्तीसगढ़ की राजनीति में इसकी कांव-कांव आगे भी सुनाई देती है।

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- अमित मिश्रा ने वर्ष 1984 से पत्रकारिता को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में अपनाया और तब से लगातार पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चार दशकों से अधिक की उनकी यह यात्रा समाचार, समाज और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से सामने रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
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